जाति की राजनीति में छत्तीसगढ़ का युवा मतदाता, परिणाम बताएगा...

जाति की राजनीति में छत्तीसगढ़ का युवा मतदाता, परिणाम बताएगा...
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दक्षिणापथ, दुर्ग। चुनावी राजनीति में सब जायज है। जातिगत कार्ड राजनीति का सदा प्रभावी पहलू रहा है। दुर्ग के कांग्रेस प्रत्याशी राजेंद्र साहू भी यदि लोकसभा क्षेत्र के पांच लाख साहू मतदाताओं को जाति के आधार पर साधने की रणनीति पर चलें, तो उनके सेहत के लिए यह बेहतर ही होगा। इसी आधार पर स्व ताराचंद साहू लगातार दुर्ग सीट पर चुनाव जीतते गए, तब से साहू समाज एक तरह से भगवा चोले के आवरण में घिरता गया। और आज जाति का यह राजनीतिक ध्रुवीकरण भाजपा प्रत्याशी विजय बघेल को लाभ पहुंचाने की स्थिति में है। 

सियासत पर नजर रखने वाले मानते हैं कि देश की राजनीति अगड़ा, पिछड़ा और दलित में वर्गीकृत हो चला है। उत्तर प्रदेश और बिहार से शुरू हुआ यह राजनीतिक प्रयोग थोड़ा बहुत छत्तीसगढ़ तक भी पहुंच गया तो इसमें हैरत नही। छत्तीसगढ की सीमा आखिर इन राज्यों से टच करता है। छत्तीसगढ़ और झारखंड जब राज्य नही बना था, तब से जातिगत वैचारिक संक्रमण की हवा बहने लगी थी। 
विजय बघेल और राजेंद्र साहू पिछड़ा वर्ग से वास्ता रखते हैं। पहले भी ताराचंद साहू और चंदूलाल चंद्राकर इसी पृष्टभूमि से चल कर आए थे। पिछड़ा वर्ग के दो प्रत्याशी जब आमने सामने हो तो जातिगत समीकरण चुनावी गणित का स्वाभाविक हिस्सा बन गया। पर देखने वाली बात यह है कि मतदाता इस समीकरण और  लोकल लीडरशिप के इतर मोदी के चेहरे को कितना वरीयता देते है?
भाजपा और कांग्रेस दोनों दल के नेता बराबर यह कह रहे हैं कि यह लोकसभा चुनाव देश के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। कोई भविष्य का सब्जबाग दिखा रहा है तो कोई गणतंत्र के खतरे में होने की दुहाई दे रहा है। भयदोहन दोनो तरफ है। 
लेकिन दुर्ग संसदीय क्षेत्र के आम मतदाताओं को लोकसभा की यह 18 वीं चुनाव कितना खास लगता है, यह मतदान का प्रतिशत तय करेगा। दो लाख नए और 60% युवा मतदाता क्या जनादेश देते है यह गणतंत्र के महान पर्व के लिए अहम होगा। यदि बात करें युवा मतदाताओं की, तो यह सच है कि सरकार से वे बहुत ज्यादा खुश नहीं है। पर बेहतर विकल्प के अभाव में छत्तीसगढ़ का युवा तबका मोदी के चेहरे को तरजीह दे रहा है। जमीनी विकास के बजाए हवाई विकास के शिगूफे उन्हे ज्यादा भा रहा है। हिलोर मारते हिंदुत्व की लहर में युवाओं को मोदी और भाजपा अपना पैरोकार प्रतीत हो रहा है। पिछले दस सालों में किसी बड़े घोटाले का सामने नहीं आना जीरो टोलरेंस को प्रेरित करता लगता है। युवाओं को लग रहा है कि दुनिया में हिंदुस्तान का डंका मोदी के कारण बज रहा है। राम मंदिर, नक्सल समस्या व पाकिस्तानी आतंक पर कड़ा रुख हिंदुस्तान की नई जमात को भा रहा है। 
अपने पिछले पांच सालों के कार्यकाल में कांग्रेस की भूपेश सरकार ने ऐसा हर जतन किया था, कि 2018 के चुनाव में पांच साल उनकी सरकार फिर रिपीट हो। किंतु तमाम प्रयासों के बावजूद जनता ने सरकार ऐसा बदल दिया, कांग्रेस के बड़े बड़े रणनीतिकारों की योजना धराशाई हो गया। स्वयं भूपेश बघेल को भान नहीं था कि इतनी लोक लुभावन कार्यों के बावजूद सरकार चली जायेगी। 
मगर सरकार सच में चली गई। दुर्ग संसदीय क्षेत्र के सिर्फ पाटन और भिलाई नगर विधानसभा में कांग्रेस अपनी सीट बचा सकी।
दुर्ग और साजा में अरुण वोरा तथा रविंद्र चौबे को अपने जीवन का सबसे बड़ा हार झेलना पड़ा। वह भी महज छः महीना पहले।