दुर्ग। जय आनंद मधुकर रतन भवन, बांधा तालाब दुर्ग में चल रहे आध्यात्मिक वर्षावास के अंतर्गत आयोजित धर्मसभा को संबोधित करते हुए राष्ट्र संत मानव मिलन के संस्थापक मणिभद्र मुनि जी महाराज ने कहा कि साधु-संत अपनी प्रतिज्ञा के कारण किसी भी ऐसी वस्तु को ग्रहण नहीं करते, जो उन्हें दी नहीं गई हो। जिस वस्तु पर किसी व्यक्ति का व्यक्तिगत अधिकार नहीं है और जो सार्वजनिक उपयोग की है, उसे भी साधु बिना अनुमति के ग्रहण नहीं करते। साधु जीवन में सूक्ष्म से सूक्ष्म अदत्तादान से भी बचने का प्रयास किया जाता है।
मुनिश्री ने कहा कि गृहस्थ जीवन में साधु जैसी कठोर मर्यादाओं का पालन करना हर व्यक्ति के लिए संभव नहीं होता, लेकिन श्रावक को भी यह प्रयास करना चाहिए कि वह किसी की वस्तु बिना अनुमति के न ले और न ही किसी के अधिकार का अनुचित लाभ उठाए। दूसरे के अधिकार का सम्मान करना ही अच्छे संस्कारों की पहचान है
उन्होंने कहा कि दूसरों के दुर्भाग्य को अपना सौभाग्य समझना ही सबसे बड़ा दुर्भाग्य है। हमें कभी भी किसी दूसरे की परेशानी, कमजोरी या नुकसान का फायदा नहीं उठाना चाहिए। हमारा सुख और सफलता किसी दूसरे के दुख का कारण नहीं बनना चाहिए।
राष्ट्र संत ने कहा कि अपनी क्षमता और संपन्नता का जरूरत से ज्यादा प्रदर्शन करना भी उचित नहीं है। कई बार आवश्यकता से अधिक दिखावा व्यक्ति के लिए परेशानी और असफलता का कारण बन जाता है। इसलिए जीवन में सादगी, संयम और संतोष को अपनाना चाहिए।
उन्होंने समाज और संघ के प्रति अपनी जिम्मेदारी का उल्लेख करते हुए कहा कि समाज ने हमें आगे बढ़ने में सहयोग दिया है और हमारी आर्थिक स्थिति को मजबूत बनाने में अपना योगदान दिया है। इसलिए जब भी समाज या संघ को हमारी आवश्यकता हो, हमें अपनी क्षमता के अनुसार सहयोग करना चाहिए।
-तपस्वियों ने बढ़ाया उपवास का क्रम ...
धर्मसभा में तपस्या की विशेष अनुमोदना का अवसर भी आया। बड़ी तपस्या कर रहे तपस्वियों ने राष्ट्र संत मणिभद्र मुनि जी महाराज के हाथों अपने उपवास को आगे बढ़ाने का संकल्प लिया।
टीकाराम जी ने 16 उपवास का संकल्प लिया। वहीं पूनम देशलहरा, भूमिका पारख, सुनीता भंडारी एवं मंजू संचेती ने 14 उपवास का संकल्प लिया। खुशबू बाघमार ने 13 उपवास का संकल्प लिया। वहीं शुभम, रतन बोहरा, स्तुति पारख एवं संयमी पारख ने 6 उपवास का संकल्प दोहराया।
धर्मसभा में उपस्थित श्रावक-श्राविकाओं ने सभी तपस्वियों की सुखसाता पूछते हुए उनके तप की अनुमोदना की और तपस्वियों का उत्साहवर्धन किया। तपस्वियों के सम्मान एवं तप की अनुमोदना के निमित्त घीसूलाल जी पारख परिवार तथा रमेश जी एवं सुरेश जी बाघमार नवकार महामंत्र जप अनुष्ठान का लाभ लिया है।
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