होम / दुर्ग-भिलाई / दुर्ग शहर में सौंदर्यीकरण के दावे पर डिवाईडर में सुखते पौधे लगा रहे है पलीता
दुर्ग-भिलाई
-जिम्मेदार कौन? नगर निगम या पीडब्ल्यूडी, तेजी से विकसित होने वाला पौधा कोनोकार्पस भी पतझड़ में बदला
दुर्ग। शहर में पीडब्ल्यूडी द्वारा निर्मित सड़क पर मिनीमाता चौक पुलगांव से रायपुर नाका तक बनाए गए डिवाईडर में सौंदर्यीकरण और पर्यावरण संरक्षण के लिए लगाए गए पौधे देखरेख के अभाव में सुखकर पतझड़ के रुप में तब्दील हो रहे है। अमूमन यहीं स्थिति अन्य सड़कों के डिवाईडर में लगे पौधों की भी है, लेकिन पतझड़ बन रहे इन महंगे पौधों को बचाने के लिए पीडब्ल्यूडी द्वारा कभी सुध नहीं ली गई, वहीं नगर निगम शहर सौंदर्यीकरण की जरुर फिक्रममंद होने का दावा करती है, लेकिन उनके द्वारा जल छिड़काव के अलावा पौधों को हराभरा बनाने की दिशा में किए जा रहे कार्य केवल खानापूर्ति साबित हो रहे है। जिसकी वजह से डिवाईडर में लगे पौधे सुखकर खत्म होने के कगार पर है। बता दें कि सड़कों पर सौंदर्यीकरण के लिए कोनोकार्पस प्रजाति के पौधे लगाए गए है। मजेदार बात है कि इस प्रजाति के पौधे इसलिए लगाए जाते है कि कोनोकार्पस के पौधे तेजी से विकसित होते है,लेकिन इन पौधे को भी पीडब्ल्यूडी और नगर निगम दोनो मिलकर पूर्ण रुप से विकसित नही कर पा रहे है,तो शहर में सौंदर्यीकरण के लिए लगाए गए अन्य प्रजातियों के पौधों का क्या हाल होगा, यह सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। कोनोकार्पस पौधों के सुखने पर तफ्तीश की गई, तो निगम सूत्रों से पता चला कि इन पौधों के सुखने की वजह कोई और नहीं बल्कि नगर निगम के सफाई कामगार ही है। बताया गया है कि सफाई कामगार सड़कों की साफ-सफाई करते है, तो साफ-सफाई से एकत्रित कचरा जल्दबाजी में वे डिवाईडर में ही फेंक देते है। सड़क से एकत्रित किए गए इन कचरों में ऑयल मिश्रित कचरे एवं पॉलीथीन शामिल होते है। जो डिवाईडर में लगे पौधों के विकसित होने में बाधक बनते है। नगर निगम सूत्रों का यह तर्क जरुर सही हो सकता है, लेकिन सौंदर्यीकरण एवं पर्यावरण संरक्षण के लिहाज से यह बेहद चिंतनीय विषय है कि इस व्यवस्था में बदलाव लाने की जिम्मेदारी किसकी है? केवल कह देने से बदलाव नहीं आएगा। व्यवस्था बदलने या सफाई कामगारों को समझाई देने की नगर निगम और पीडब्ल्यूडी दोने की जिम्मेदारी है, अन्यथा की स्थिति में महंगे पौधे खरीदना व्यर्थ साबित होगा। ऐसी स्थिति में पौधे खरीदी में भ्रष्टाचार का सवाल उठना स्वाभाविक है, साथ ही शहर में सौंदर्यीकरण एवं पर्यावरण संरक्षण के लिए कार्य करने का दावा करना बेईमानी साबित होगा।
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