होम / दुर्ग-भिलाई / बाहर नहीं, अपने भीतर खोजिए परमात्मा को-राष्ट्रसंत मणिभद्र मुनि जी
दुर्ग-भिलाई
-भक्तांबर संपुष्ट अनुष्ठान की 16वीं गाथा में साधकों को मिला आत्मचिंतन और अंतर्मुखी साधना का संदेश
दुर्ग। जय आनंद मधुकर रतन भवन, बांधा तालाब, दुर्ग में आध्यात्मिक एवं भक्तिमय वातावरण में चल रहे 44 दिवसीय भक्तांबर संपुष्ट अनुष्ठान में श्रद्धालु प्रतिदिन बड़ी संख्या में सहभागी होकर भक्ति एवं साधना का लाभ ले रहे हैं। अनुष्ठान के अंतर्गत 16वें अध्याय की गाथा की व्याख्या करते हुए मानव मिलन के संस्थापक, नेपाल केसरी राष्ट्रसंत डॉ. मणिभद्र मुनि जी महाराज ने श्रद्धालुओं को परमात्मा की खोज के लिए बाहरी भटकाव छोड़कर अपने भीतर झांकने का प्रेरणादायी संदेश दिया।
धर्मसभा को संबोधित करते हुए मुनिश्री ने कहा कि “शांत हो जाइए, आंखें बंद कीजिए और एक बार ईमानदारी से अपने भीतर देखिए। जिस परमात्मा को हमने तीर्थों में, मंदिरों में, धर्म स्थानकों में, पहाड़ों में और आकाश में खोजा, क्या कभी उसी परमात्मा को अपने भीतर खोजने का प्रयास किया?”
उन्होंने कहा कि मनुष्य की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि जिसे पाने के लिए वह पूरी जिंदगी बाहर भटकता रहता है, वह परमात्मा उसके अत्यंत निकट, उसके अपने भीतर विद्यमान है। उसके लिए कहीं जाने की आवश्यकता नहीं, केवल स्वयं के भीतर उतरने की आवश्यकता है।
मुनिश्री ने कहा कि बाहर भीड़ है, आवाज है, इच्छाएं हैं, सपने हैं, तुलना और प्रतियोगिता है। इसलिए मन निरंतर बाहर की ओर भागता रहता है। लेकिन भीतर मौन है और मनुष्य अक्सर इसी मौन से डरता है। जब व्यक्ति भीतर उतरता है तो पहली बार उसे अपने वास्तविक अस्तित्व का सामना होता है। बाहर की सारी आवाजें शांत होने पर भीतर से उठने वाली जो आवाज सुनाई देती है, वह किसी मंदिर की घंटी या शास्त्रों के मंत्र की आवाज नहीं, बल्कि स्वयं के अस्तित्व की आवाज है। यही आत्मचिंतन परमात्मा की ओर जाने का पहला द्वार है।
मुनिश्री ने आगे कहा कि जब मनुष्य गहरे दुख में होता है, तब कई बार उसे किसी व्यक्ति की आवश्यकता महसूस नहीं होती। वह अकेले बैठना चाहता है। ऐसे क्षणों में जब मन अचानक शांत हो जाता है और भीतर एक ऐसी उपस्थिति का अनुभव होता है जिसे शब्दों में व्यक्त करना कठिन है, वहीं से परमात्मा की पहली झलक मिलनी प्रारंभ होती है।
उन्होंने श्रद्धालुओं को संदेश दिया कि धार्मिक साधना केवल बाहरी क्रियाओं तक सीमित न रहे, बल्कि व्यक्ति अपने भीतर झांककर आत्मा की अनुभूति और आत्मचिंतन की दिशा में आगे बढ़े। सच्ची आध्यात्मिक यात्रा बाहर से भीतर की ओर जाने की यात्रा है।
जय आनंद मधुकर रतन भवन में चल रहे इस भक्तांबर संपुष्ट अनुष्ठान के दौरान प्रतिदिन श्रद्धालु श्रद्धा और भक्ति के साथ गाथाओं का श्रवण एवं आराधना कर रहे हैं। आध्यात्मिक वातावरण में चल रहे इस अनुष्ठान में सहभागी साधक भाव-विभोर होकर भक्तांबर की आराधना कर रहे हैं।
आज की भक्तांबर गाथा का लाभ प्रवीण श्रीश्रीमाल परिवार द्वारा लिया गया। यह भक्तांबर संपुष्ट अनुष्ठान लगातार 44 दिनों तक जय आनंद मधुकर रतन भवन, बांधा तालाब, दुर्ग में आयोजित किया जा रहा है।
मानव मिलन के स्थापना दिवस पर नवगठित दुर्ग शाखा द्वारा विशाल रक्तदान शिविर का आयोजन जय आनंद मधुकर रतन भवन बांध तालाब दुर्ग में आयोजित कर रहा है जिसमें बड़ी संख्या में रक्तदान होने की उम्मीद जताई जा रही है।
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