-वृद्धजनों के अनुभवों ने सिखाया जीवन का पाठ, सेवा के साथ हुआ आत्मीय संवाद

भिलाई। पितृपक्ष में हम अपने पूर्वजों को याद करते हैं, तर्पण करते हैं और उनकी स्मृतियों को नमन करते हैं। लेकिन एक सवाल हमें स्वयं से भी पूछना चाहिए - हमारे आसपास जो बुजुर्ग आज हमारे बीच हैं, क्या उनके लिए हमारे पास थोड़ा-सा समय, सम्मान और अपनापन है? इसी सामाजिक चिंतन के साथ अंतर्राष्ट्रीय वृद्धजन दिवस एवं पितृपक्ष के अवसर पर सेक्टर-8 भिलाई स्थित आस्था वृद्ध आश्रम में सेवा कार्य किया गया। वृद्धजनों को भोजन कराया गया और उनके साथ आत्मीय संवाद कर उनके अनुभवों को सुना गया।
इस अवसर पर अध्यात्म पथ सेवा परिवार छत्तीसगढ़ के सदस्यों ने आस्था वृद्ध आश्रम पहुंचकर सेवा कार्य में सहभागिता की। सदस्यों ने वृद्धजनों के साथ समय बिताया, उनसे आत्मीय संवाद किया और भोजन सेवा के माध्यम से उनके प्रति सम्मान एवं अपनत्व व्यक्त किया।
कार्यक्रम में आचार्य डॉ. अजय आर्य, अनीता भारद्वाज, श्रीमती सुमन नारायण मोहिते, भारद्वाज दंपती, राजकुमार भल्ला, अंकित आर्य, नंदलाल आर्य, प्रशस्या क्षत्रिय, प्रचित क्षत्रिय एवं नमित क्षत्रिय सहित सेवाभावी लोग उपस्थित रहे।
आचार्य डॉ. अजय आर्य ने कहा कि पितरों को याद करने का सबसे सुंदर तरीका यह है कि हम अपने वर्तमान के वृद्धजनों को सम्मान और अपनापन दें। उन्होंने कहा कि आज हम अपने बच्चों को समय देने के लिए समय खोजते हैं और अपने बुजुर्गों के लिए समय निकालने का बहाना। जबकि सच यह है कि बुजुर्गों के पास देने के लिए सबसे मूल्यवान चीज - जीवन का अनुभव - आज भी मौजूद है।
सेवा के दौरान वातावरण में गंभीरता के साथ आत्मीय मुस्कान भी दिखाई दी। किसी ने हल्के-फुल्के अंदाज में कहा कि बुजुर्गों के पास अनुभव इतना है कि गूगल भी उनसे सलाह लेकर अपडेट हो जाए! इस बात पर सभी के चेहरे खिल उठे। वास्तव में उम्र बढ़ने के साथ व्यक्ति की उपयोगिता समाप्त नहीं होती, बल्कि उसके अनुभव की कीमत बढ़ती जाती है।
श्रीमती सुमन नारायण मोहिते ने कहा कि वृद्धजनों के साथ कुछ समय बिताकर महसूस हुआ कि उन्हें केवल भोजन की नहीं, बातचीत और अपनत्व की भी भूख है। कई बार हम उनके लिए महंगी वस्तुएं खरीद देते हैं, लेकिन उनके पास बैठकर दस मिनट बात करने का समय नहीं निकाल पाते।
अनीता भारद्वाज ने कहा कि वृद्धाश्रम हमें यह सोचने के लिए विवश करता है कि जिस घर को कभी बुजुर्गों ने अपने हाथों से बसाया, उसी जीवन की संध्या में उन्हें अकेलेपन का सामना क्यों करना पड़े।
राजकुमार भल्ला ने कहा कि सेवा किसी पर उपकार नहीं, बल्कि समाज के प्रति हमारी जिम्मेदारी है। आज हम किसी बुजुर्ग का हाथ थामेंगे तो कल हमारी अगली पीढ़ी भी यही संस्कार सीखेगी।
अंकित आर्य ने कहा कि बुजुर्गों की बातें कभी-कभी लंबी जरूर होती हैं, लेकिन उनमें जिंदगी की ऐसी बातें छिपी होती हैं, जिन्हें छोटी-छोटी किताबों में नहीं पाया जा सकता।
नंदलाल आर्य ने कहा कि पितृपक्ष हमें अपनी जड़ों को याद करने का अवसर देता है और वृद्धजनों की सेवा उन जड़ों के प्रति हमारी जीवंत कृतज्ञता है। प्रशस्या क्षत्रिय ने कहा कि वृद्धजनों के चेहरे पर आई छोटी-सी मुस्कान यह सिखाती है कि खुशी बांटने के लिए बहुत बड़ी चीजों की नहीं, केवल सच्चे मन की जरूरत होती है। प्रचित क्षत्रिय एवं नमित क्षत्रिय ने कहा कि बुजुर्गों के साथ समय बिताना अपने आप में एक सीख है। उनकी स्मृतियां परिवार और समाज की जीवित धरोहर हैं।
आस्था वृद्ध आश्रम के संचालक प्रकाश गेडाम ने सभी अतिथियों का हार्दिक स्वागत किया तथा सेवा कार्य के लिए उपस्थित सभी लोगों के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि समाज के संवेदनशील लोगों का आश्रम में आना वृद्धजनों के लिए केवल सहयोग नहीं, बल्कि अपनत्व और सम्मान का संदेश भी है।
कार्यक्रम में उपस्थित लोगों ने कहा कि वृद्धाश्रम केवल एक भवन नहीं, बल्कि समाज के लिए एक आईना है। यह हमें याद दिलाता है कि विकास और आधुनिकता के बीच कहीं हमारी संवेदनाएं पीछे न छूट जाएं। पितृपक्ष में तर्पण के साथ यदि हम किसी जीवित बुजुर्ग की आंखों में संतोष और चेहरे पर मुस्कान ला सकें, तो यही हमारी संवेदनशीलता की सबसे सार्थक अभिव्यक्ति होगी। सेवा कार्य के अंत में सभी ने संकल्प लिया कि वृद्धजनों की सेवा केवल किसी विशेष दिवस या पितृपक्ष तक सीमित न रहकर जीवन के संस्कार का हिस्सा बने। क्योंकि बुजुर्ग हमारे अतीत की कहानी नहीं, हमारे भविष्य के संस्कार हैं। श्रीमती अलका संदीप भंडरवार, सेनेगल, पश्चिम अफ्रीका द्वारा यह कार्यक्रम स्पॉन्सर किया गया।
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