-गणपति विहार में बिखरी कविता की खुशबू, हास्य-व्यंग्य और संवेदनाओं से सजी काव्य संध्या
-महिला कवयित्रियों की सशक्त प्रस्तुतियों ने बांधा समां, हंसी के ठहाकों और सामाजिक सरोकारों से देर तक गूंजता रहा काव्य मंच

दुर्ग। गणपति विहार फर्स्ट फेस 'सहयोग' की ओर से आयोजित भव्य कवि सम्मेलन में कविता के विविध रंग देखने को मिले। हास्य, व्यंग्य, प्रेम, राष्ट्रभाव, सामाजिक सरोकार और मानवीय संवेदनाओं से सजी इस काव्य संध्या में महिला कवयित्रियों ने अपनी सशक्त रचनाओं से विशेष प्रभाव छोड़ा, वहीं हास्य और व्यंग्य की प्रस्तुतियों ने श्रोताओं को देर तक गुदगुदाया।
कार्यक्रम के सूत्रधार प्रोफेसर अंबरीश त्रिपाठी रहे, जबकि प्रमुख संचालक एवं संयोजक आचार्य डॉ. अजय आर्य ने अपनी चुटीली, सहज और प्रभावशाली शैली से पूरे आयोजन को जीवंत बनाए रखा। उन्होंने हास्य-चुटकुलों, पति-पत्नी के रिश्तों पर रोचक कटाक्ष तथा जीवन की छोटी-बड़ी विसंगतियों को व्यंग्य के माध्यम से प्रस्तुत कर श्रोताओं को खूब हंसाया। उनके संचालन की विशेषता यह रही कि हास्य केवल ठहाकों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उसके भीतर जीवन, रिश्तों और सामाजिक व्यवहार पर विचार करने का संदेश भी दिखाई दिया।
कवि के.डी. वैष्णव ने 'बीड़ी और पीढ़ी' के माध्यम से बदलते सामाजिक परिवेश पर व्यंग्यात्मक टिप्पणी की। उन्होंने बीड़ी के धीरे-धीरे विलुप्त होने के बहाने उस पीढ़ी के बदलते स्वरूप को रेखांकित किया, जो समाज, संस्कृति और परंपराओं की चर्चा किया करती थी। उनकी प्रस्तुति ने श्रोताओं को हंसाने के साथ-साथ बदलते सामाजिक मूल्यों पर सोचने के लिए भी प्रेरित किया।
हेमलाल कुरेशिया ने जल संरक्षण और राष्ट्रप्रेम को अपनी रचनाओं का विषय बनाया। 'जल की कल-कल में भी मैं एक नया राग सुनता हूं' के माध्यम से उन्होंने जल को जीवन का आधार बताते हुए उसके संरक्षण का संदेश दिया। वहीं 'मेरे सीने में भी तो हिन्दुस्तान है' के माध्यम से राष्ट्र की प्रगति में प्रत्येक नागरिक की भूमिका और तिरंगे के प्रति गौरव की भावना को स्वर दिया।
श्रीमती प्रेम सिंह 'काव्या' ने गुरु महिमा पर भावपूर्ण रचना प्रस्तुत की। 'इस जनम में हमको कितने दान मिल गए, गुरु क्या मिले भगवान मिल गए' जैसी पंक्तियों ने गुरु के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता की भावना को प्रभावशाली ढंग से अभिव्यक्त किया और श्रोताओं को भावविभोर कर दिया।
श्रीमती सीता गुप्ता ने नन्ही चिड़िया के माध्यम से परिश्रम और पुरुषार्थ का संदेश दिया। उनकी कविता ने यह भाव उभारा कि जीवन में सफलता केवल संयोग का परिणाम नहीं, बल्कि निरंतर श्रम, संघर्ष और कर्मठता का फल है।
श्रीमती वेणु कुरेशिया ने बदलते बचपन की तस्वीर को बेहद मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया। 'कभी आंगन में खेला करता था बचपन, अब स्क्रीन में सिमट गया है बचपन' के माध्यम से उन्होंने मोबाइल और स्क्रीन के बढ़ते प्रभाव पर संवेदनशील प्रश्न उठाया। उनकी रचना ने यह संदेश भी दिया कि बच्चे केवल वही नहीं सीखते जो उन्हें सिखाया जाता है, बल्कि वे अपने बड़ों के व्यवहार और आचरण से भी बहुत कुछ सीखते हैं।
श्रीमती सुनीता परगनिहा ने रिश्तों की पहचान और मन की दुविधा को अपनी कविता में स्वर दिया - 'मेरी अंतः की आवाज कहने लगी है आज, कौन है अपना, कौन पराया...' उनकी रचना ने मानवीय संबंधों की संवेदनशीलता और बदलते रिश्तों के भाव को प्रभावशाली ढंग से सामने रखा।
श्रीमती अल्पना त्रिपाठी तथा अन्य रचनाकारों ने भी अपनी विविध रचनाओं से काव्य संध्या को समृद्ध किया। मंच पर कहीं हास्य की फुहार थी, कहीं व्यंग्य की धार, कहीं प्रेम और संवेदना की गहराई तो कहीं राष्ट्र और समाज के प्रति जिम्मेदारी का भाव दिखाई दिया।
कार्यक्रम के समापन अवसर पर आचार्य डॉ. अजय आर्य ने अपने प्रेम-केंद्रित काव्य संग्रह 'मुझको भी जीने की वजह दे दे' की प्रति प्रोफेसर अंबरीश त्रिपाठी को सप्रेम भेंट की। यह आत्मीय क्षण पूरे आयोजन की साहित्यिक गरिमा को और बढ़ा गया। प्रेम की संवेदना को व्यक्त करते हुए उन्होंने अपनी चर्चित पंक्तियां प्रस्तुत कीं - 'अपने मन के मकान में थोड़ी सी जगह दे दे, मुझको भी जीने की वजह दे दे।' उनकी इन पंक्तियों को श्रोताओं ने सराहा।
कार्यक्रम में के.डी. वैष्णव, आचार्य डॉ. अजय आर्य, राजेंद्र शर्मा, हेमलाल कुरेशिया, श्रीमती अल्पना त्रिपाठी, श्रीमती प्रेम सिंह 'काव्या', श्रीमती वेणु कुरेशिया, श्रीमती सुनीता परगनिहा सहित अन्य कवि-कवयित्रियों ने अपनी रचनाओं से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध किया।
आयोजन में भूषण देवांगन, मन्नूलाल परगनिहा, डॉ. नाथ, प्रवीण पटेल, अनिल सूरे, निशिकांत परगनिहा, पी.आर. साहू, पतिराम साहू, आर.के. गुप्ता, महेश शर्मा, श्रीमती मंजू परगनिहा और नीरज गुप्ता सहित गणपति विहार के अनेक साहित्यप्रेमी एवं गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।
गणपति विहार फर्स्ट फेस 'सहयोग' का यह आयोजन इस बात का सुंदर उदाहरण रहा कि कविता केवल शब्दों की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि हंसी, संवेदना, सामाजिक चेतना, प्रेम और मानवीय रिश्तों को जोड़ने वाली जीवंत कला है। देर तक गूंजती तालियों और श्रोताओं के उत्साह ने काव्य संध्या की सफलता को यादगार बना दिया।
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