
दुर्ग। छत्तीसगढ़ की धार्मिक नगरी दुर्ग के सत्तीचौरा गंजपारा में इस वर्ष भी पर्यावरण संरक्षण का संदेश देते हुए केवल गोबर के कंडों, कपूर, लौंग, इलायची और सुगंधित धूप से होलिका दहन किया गया। यह पहल पूरे जिले में सराहना का विषय बनी हुई है।
आम तौर पर होलिका दहन में लकड़ियों के साथ विभिन्न प्रकार की सामग्री जलाई जाती है, जिससे प्रदूषण फैलने की आशंका रहती है। इसे ध्यान में रखते हुए सत्तीचौरा में पिछले 10 वर्षों से केवल गोबर के कंडों से होलिका दहन करने की परंपरा निभाई जा रही है। इस वर्ष लगभग 4200 गोबर के कंडे, 2 किलो कपूर, 500 ग्राम लौंग, 500 ग्राम इलायची, गुड़ और नीम के सूखे पत्तों का उपयोग किया गया।
गौठान और गौशाला को मिला लाभ
आयोजक प्रमुख योगेन्द्र शर्मा ‘बंटी’ ने बताया कि समिति द्वारा शहरभर में होलिका दहन समितियों से गोबर के कंडों के उपयोग की अपील की गई थी। इसके सकारात्मक परिणाम स्वरूप इस वर्ष शहर के 20 से अधिक स्थानों पर गोबर के कंडों से होलिका जलाई गई। इससे गौठान और गौशालाओं में कंडों की अच्छी बिक्री हुई, जिससे गौ-सेवा के लिए आर्थिक सहयोग प्राप्त हुआ। शहर में करीब 10 हजार से अधिक कंडों की बिक्री हुई।
परंपरा और श्रद्धा का संगम
सत्तीचौरा में प्रातः 8 बजे होलिका दहन स्थल पर गोबर से लेपन किया गया। महिलाओं ने विधिवत पूजा-अर्चना की। इसके बाद अलग-अलग स्थानों से गोबर के कंडे एकत्रित कर लगभग 7 फीट ऊंची और 10 फीट चौड़ी होलिका सजाई गई। होलिका में होलिका माता और भक्त प्रह्लाद की आकर्षक प्रतिमा स्थापित की गई थी।
पंडित सुनील पांडेय द्वारा मंत्रोच्चार के साथ विधिवत पूजन कराया गया। ढोल-नगाड़ों की धुन पर आरती की गई और सभी ने एक-दूसरे को गले मिलकर होली की शुभकामनाएं दीं। छोटे-बड़े सभी ने पारंपरिक तरीके से आशीर्वाद लिया।
100 वर्षों से अधिक पुरानी परंपरा
सत्तीचौरा में होलिका दहन की परंपरा 100 वर्षों से भी अधिक समय से चली आ रही है। इस वर्ष की पर्यावरण हितैषी पहल को देखने सुबह से ही शहर के सैकड़ों लोग पहुंचे और समिति के प्रयासों की प्रशंसा की।
होलिका दहन कार्यक्रम में क्षेत्र की पार्षद प्रतिभा सुरेश गुप्ता सहित बड़ी संख्या में गणमान्य नागरिक, महिलाएं, पुरुष और बच्चे उपस्थित रहे।
संदेश स्पष्ट है — परंपरा के साथ पर्यावरण संरक्षण भी संभव है, बस आवश्यकता है सकारात्मक सोच और सामूहिक प्रयास की।
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