होम / दुर्ग-भिलाई / ओटेबंद बगीचा गांव में क्षीरसागर मुद्रा में विराजमान भगवान विष्णु, कदंब के पेड़ में नारियल बांधने की परंपरा
दुर्ग-भिलाई
-बालोद में स्थित लक्ष्मी नारायण मंदिर काफी दूर दूर तक प्रसिद्ध है. कहा जाता है कि यहां मांगी हुई मन्नत जरूर पूरी होती है
-भव्य महायज्ञ और भव्य 11 दिवसीय मेला 19 फरवरी से
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अंडा। बालोद व दुर्ग जिले की सीमा पर बसा ओटेबंद बगीचा गांव गुंडरदेही ब्लॉक में आता है. इस गांव के मंदिरों की अपनी विशेष पहचान है. इस क्षेत्र में भगवान विष्णु का काफी प्रसिद्ध मंदिर है. जिसमें विष्णु क्षीरसागर की मुद्रा में विराजमान है. साथ ही माता लक्ष्मी उनके पैर दबाते हुए नजर आ रही है. हर साल फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष पर यहां 11 दिनों का मेला लगता है. जिसे देखने दूर दूर से लोग आते हैं।
इस बार श्री विष्णु महायज्ञ एवं श्रीमद् भागवत कथा का भव्य आयोजन 19 फरवरी गुरुवार से 01 मार्च रविवार 2026 तक किया जा रहा है। यह पावन आयोजन क्षेत्र में धर्म, भक्ति और आध्यात्मिक चेतना का विशेष संदेश लेकर आ रहा है।
इस अवसर पर श्रीमद् भागवत कथा का पावन वाचन संत राजीव नयन जी महाराज (श्रीधाम वृन्दावन) के श्रीमुख से किया जाएगा। कथा का आयोजन 21 फरवरी से 01 मार्च 2026 तक प्रतिदिन दोपहर 1:00 बजे से सायं 5:00 बजे तक संपन्न होगा, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं शामिल होने की अपील किया है।
फाल्गुन शुक्ल पक्ष में हर साल लगता है मेला ..
ओटेबंद बगीचा गांव के विष्णुमंदिर में मेला लगने की परंपरा साल 1961 से शुरू हुई. तब से हर साल फाल्गुन शुक्ल पक्ष में मेला लगता आया है. इस मेले में शामिल होने भक्तों के साथ ही देश भर के साधु संत आते हैं. इस मंदिर में एक ऐसी मूर्तियों की श्रृंखला है जो देव उठनी पर केंद्रित है. इस मंदिर में भगवान विष्णु लक्ष्मी सहित अन्य देवी-देवता भी विराजित है.
मंदिर समिति के संस्थापक सदस्य वीरेंद्र कुमार दिल्लीवार बताते हैं कि 1961 से हमारे पूर्वजों ने फाल्गुन शुक्ल पक्ष पर मेला शुरू किया.मंदिर की स्थापना 1994 में शुरू हुई जो 1996 में पूरी हुई. सनातन हिन्दू महर्षि करपात्री महराज यहां आए और इस तीर्थ को तपोभूमि की संज्ञा दी. इस मंदिर में चार शंकराचार्य का आगमन भी हो चुका है.
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कदंब के वृक्ष की अनोखी लीला ..
मंदिर समिति के संस्थापक बताते हैं कि इस मंदिर में एक कदंब का वृक्ष है. इस कदंब के वृक्ष से मांगी गई मन्नत जरूर पूरी होती है. बताया जाता है कि कदंब के वृक्ष में राधा रानी और श्री कृष्ण विराजमान है. मन्नत पूरी करने के लिए यहां नारियल बांधा जाता है.
इंदौर का एक परिवार जिनके कोई संतान नहीं थे. उन्होंने यहां मन्नत मांगी और एक वर्ष के भीतर उन्हें संतान सुख की प्राप्ति हुई. एक व्यक्ति का ट्रक 15 महीने से खो गया. मंदिर में स्थित कदंब वृक्ष की मान्यता के बारे में पता चलने पर यहां आकर मन्नत मांगी. दूसरे ही दिन ट्रक मिल गया-वीरेंद्र कुमार दिल्लीवार, संस्थापक सदस्य, मंदिर समिति वृन्दावन से पहुंचे प्रमोद कृष्ण दास बताते हैं कि लक्षमी नारायण महायज्ञ का आयोजन इस मंदिर में किया गया. इसके अंतर्गत रासलीला और कथा का आयोजन किया गया. घर में धन धान्य की समस्या आने पर लक्ष्मी नारायण यज्ञ का आयोजन किया गया. बहुत आनंद आया. पहली बार यहां पहुंचे. मंदिर पहुंची शिल्फा चंद्राकर बताती है कि पिछले 64 सालों से इस मंदिर में फाल्गुन मेला लगता आया है. हर साल मंदिर में आने वाले भक्तों की संख्या बढ़ती जा रही है.
श्री विष्णु महायज्ञ (मंदिर ..ओटेबंद मेला छत्तीसगढ़ के बालोद-दुर्ग जिले की सीमा (गुंडरदेही ब्लॉक) पर स्थित ओटेबंद (जगभांठा) गांव में फाल्गुन माह की शुक्ल पक्ष की द्वितीया से आयोजित होने वाला 11 दिवसीय प्रसिद्ध सांस्कृतिक और धार्मिक आयोजन है। यह लगभग 60-65 वर्षों से आयोजित हो रहा है, जहां विष्णु मंदिर में क्षीरसागर मुद्रा में विराजमान भगवान विष्णु के दर्शन के लिए हज़ारों श्रद्धालु आते हैं।
-ओटेबंद मेले की मुख्य विशेषताएं ..
अवधि: यह मेला आम तौर पर महाशिवरात्रि के दो दिन बाद से शुरू होकर फाल्गुन शुक्ल पक्ष तक 11 दिनों तक चलता है, जहाँ 11 दिवसीय महायज्ञ (विष्णु महायज्ञ) आयोजित किया जाता है।
पौराणिक मान्यताएं: ओटेबंद में स्थित विष्णु मंदिर में भगवान विष्णु के दशावतार रूप की मूर्तियां विराजमान हैं, जिसमें विष्णु क्षीरसागर की मुद्रा में हैं और माता लक्ष्मी उनके पैर दबा रही हैं।
कदंब का वृक्ष: मंदिर परिसर में एक पुराना कदंब का पेड़ है, जिसके बारे में यह मान्यता है कि इस पर नारियल और लाल कपड़ा बांधने से मनोकामनाएं (विवाह, नौकरी, संतान प्राप्ति) पूरी होती हैं।
आकर्षण: मेले में भागवत प्रवचन, रासलीला, और सांस्कृतिक कार्यक्रम होते हैं। इस क्षेत्र के लोग इसे अपनी आस्था और संस्कृति का प्रतीक मानते हैं। यह मेला दुर्ग से लगभग 18 किलोमीटर और अंडा के पास से पहुंचा जा सकता है। यह छत्तीसगढ़ के पर्यटन और धार्मिक आस्था का एक बड़ा केंद्र बन चुका है।
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