दुर्ग-भिलाई

संस्कृत प्रत्येक भारतीय की भाषा है: डॉ. दिव्या देशपांडे

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-संस्कृत भारती दुर्ग द्वारा आयोजित भाषा बोधन वर्ग का समापन

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भिलाई। संस्कृत भारती दुर्ग द्वारा आयोजित भाषा बोधन वर्ग का सफलतापूर्वक समापन हुआ। कार्यक्रम में संस्कृत को जन-जन की भाषा बनाने के संकल्प को दोहराया गया तथा इसके प्रचार-प्रसार पर विस्तृत चर्चा हुई।
मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित डॉ. दिव्या देशपांडे, प्रांत प्रमुख, संस्कृत बाल केंद्रम ने अपने प्रेरक वक्तव्य में कहा कि 'संस्कृत हर भारतीय की भाषा है। यह केवल पूजा-पाठ या शास्त्रों तक सीमित नहीं है, बल्कि जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में उपयोगी, वैज्ञानिक और व्यवहारिक भाषा है।' उन्होंने कहा कि व्यापारी, चिकित्सक, इंजीनियर अथवा इस देश में निवास करने वाला प्रत्येक व्यक्ति संस्कृत से लाभान्वित हो सकता है। संस्कृत भारत की भाषा है और भारत के प्रत्येक नागरिक को कर्तव्यबोध के साथ संस्कृत सीखनी चाहिए।
डॉ. देशपांडे ने बताया कि संस्कृत भारती का उद्देश्य संस्कृत को घर-घर तक पहुँचाना है। वर्तमान में संस्कृत भारती विश्व के 27 देशों में सक्रिय है और भारत में लगभग 6000 घरों में संस्कृत का व्यवहार किया जा रहा है। वर्तमान सूचना के अनुसार छत्तीसगढ़ में 16 ऐसे घर हैं जहाँ नियमित रूप से संस्कृत बोली जा रही है, जिन्हें 'संस्कृत गृह' के रूप में चिन्हित किया गया है। संस्कृत बाल केंद्रों के माध्यम से बच्चों में भाषा, संस्कार और संस्कृति के प्रति रुचि जागृत करने पर उन्होंने विशेष बल दिया।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि सुनील पटेल, जिला कार्यवाह ने अपने उद्बोधन में स्वदेशी, स्वभाषा और स्वसंस्कृति के प्रति सजग एवं सचेत रहने की अपील की। उन्होंने कहा कि हमें अपने दैनिक जीवन में स्वदेशी अपनाने, सुबह के सात्विक भोजन और स्वाभिमान के भाव को बनाए रखना चाहिए।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कमलेश आर्य ने की। इस अवसर पर नरेंद्र कुमार साहू प्रांत प्रशिक्षण प्रमुख, जैनेंद्र दीवान जनपद संयोजक, हरित कुमार वर्मा जनपद सहसंयोजक, अंकित शास्त्री, डॉ. अजय आर्य, जगबंधु शास्त्री वरिष्ठ कार्यकर्ता आर्य समाज तथा रवि आर्य कार्यालय मंत्री सहित अनेक संस्कृत प्रेमी एवं कार्यकर्ता उपस्थित रहे।
आर्य समाज की ओर से डॉ. अजय आर्य ने संस्कृत और भारतीय संस्कृति के प्रति अनुरक्त होने का आग्रह किया। कार्यक्रम के अंत में राजेश शास्त्री ने धन्यवाद ज्ञापन किया तथा सभी प्रतिभागियों ने संस्कृत के अध्ययन, अभ्यास और प्रचार हेतु निरंतर प्रयास करने का संकल्प लिया।

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