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‘हांथा’ समकालीन दृश्य कला प्रदर्शनी का समापन

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मौन भाषा में सामाजिक एवं सांस्कृतिक चेतना का दस्तावेजी साक्ष्य
दुर्ग।
छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोक परंपरा से प्रेरित ‘हांथा’ समकालीन दृश्य कला प्रदर्शनी का नेहरू आर्ट गैलरी, भिलाई में गरिमामय समारोह के साथ समापन हुआ।छत्तीसगढ़ प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट ग्रुप द्वारा आयोजित इस प्रदर्शनी ने समकालीन कला को केवल दृश्य सौंदर्य तक सीमित न रखते हुए विचार, चेतना और समय के गहन संवाद का सशक्त माध्यम बनाया।राज्य सहित देश के विभिन्न क्षेत्रों से आए कलाकारों की कृतियों ने दर्शकों को ठहरकर देखने, समझने और आत्ममंथन करने के लिए प्रेरित किया।
प्रदर्शनी के समापन अवसर पर डॉ अजय आर्य ने कहा कि उनके लिए इस प्रदर्शनी में शामिल होना सौभाग्य की बात है।उन्होंने कहा कि कला की भाषा मौन है और ‘हांथा’ के प्रत्येक चित्र में यही मौन अपनी पूरी कथा और इतिहास रचता है।उन्होंने एक चित्र का उल्लेख करते हुए कहा कि उसमें कोई स्पष्ट आकृति नहीं, बल्कि रेशे ही रेशे दिखाई देते हैं और वे रेशे आपस में उलझे हुए प्रतीत होते हैं।कलाकार से संवाद में यह स्पष्ट हुआ कि यह मस्तिष्क की उलझनों का प्रतीक है, उन मानसिक ग्रंथियों का रूपांकन है जिनमें आधुनिक मनुष्य निरंतर उलझा रहता है।यह समकालीन कला की वही शक्ति है जो बिना शब्दों के मनुष्य की आंतरिक स्थिति को अभिव्यक्त कर देती है।

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प्रदर्शनी में शामिल कलाकार अनिल खोरबागड़े ने वर्तमान समय की जल समस्या को अपनी कला का केंद्रीय विषय बनाया।हरियाली का रेत में परिवर्तित होना, कुओं के जल स्तर का लगातार नीचे जाना और ‘एक कौवा प्यासा था’ जैसी प्रतीकात्मक कथा के माध्यम से उन्होंने मानव और प्रकृति के टूटते संबंधों को प्रभावी ढंग से रेखांकित किया।अपने-अपने शिल्प और दृष्टि के माध्यम से कलाकारों ने कला को मानव जाति को समझने और चेताने का माध्यम बनाया, जिसे सहेज कर रखना आज के समय की आवश्यकता है।
प्रदर्शनी में कलाकारों ने छत्तीसगढ़ की संस्कृति, छत्तीसगढ़ के पारंपरिक पहरावे, लोकजीवन, प्राकृतिक सौंदर्य और छत्तीसगढ़ी सोच को भी अपनी पेंटिंग और कलाकृतियों का आधार बनाया। कई चित्रों में पौराणिक पात्र, आदम और ईव की कथा से लेकर आज की सामाजिक विडंबनाओं तक को रंगों और रेखाओं में अभिव्यक्त किया गया। इन कृतियों में मिट्टी की गंध, श्रम की गरिमा और लोक चेतना की आत्मा स्पष्ट रूप से परिलक्षित हुई।
कार्यक्रम के समापन समारोह का संचालन डॉ ध्रुव तिवारी ने किया।मुख्य अतिथि के रूप में प्रशांत तिवारी, महाप्रबंधक जनसंपर्क, सेल भिलाई इस्पात संयंत्र उपस्थित रहे।विशिष्ट अतिथि के रूप में सेवानिवृत्त प्राध्यापक शीबा प्रसाद चौधरी, मूर्तिकार, खैरागढ़ मूल निवास बेसिक असम उपस्थित रहीं।अतिथियों का स्वागत डॉ ध्रुव तिवारी द्वारा पुष्पगुच्छ एवं ‘हांथा’ प्रदर्शनी के कैटलॉग भेंट कर किया गया।कार्यक्रम के अंत में सेवानिवृत्त प्राध्यापक शीबा प्रसाद चौधरी द्वारा सभी प्रतिभागी कलाकारों को प्रमाण पत्र वितरित किए गए।इस अवसर पर कलाकार जितेंद्र साहू और शांति तिर्की की सक्रिय सहभागिता को विशेष रूप से सराहा गया। डॉ. ध्रुव तिवारी ने सभी आयोजकों अतिथियों और दर्शकों का धन्यवाद किया। आयोजकों के अनुसार ‘हांथा’ प्रदर्शनी ने यह सिद्ध किया कि समकालीन कला केवल सौंदर्य नहीं, बल्कि समाज, समय और संवेदना का जीवंत दस्तावेज है।

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प्रदर्शनी में सहभागी कलाकार प्रदर्शनी में देश के कोने-कोने से कलाकारों ने भाग लिया । सहभागी कलाकारों में अभिजीत बगनानी, अधिकल्प यादव, अजय निषाद, अनिल खोरबागड़े, अंकिता जेना, अरुण साहू, अवधेश बाजपेयी, ब्रजेश तिवारी, डॉ ध्रुव तिवारी, दयांशु देवांगन, डॉ जयप्रभा शर्मा, डॉ सविप राज, डॉ तरुणा माथुर, जी के निर्मलकर, गजेंद्र सोनी, हरीनारायण विश्वकर्मा, हुमा खान, जयश्री भगवानी, जितेंद्र साहू, कमलेश सक्सेना, किशोर कुमार शर्मा, मोहनलाल बराल, निकिता साहू, निर्वेर साहू, पियूष किवार्थ, प्रीति सोनी, प्रदीप बिश्वास, राधिका चौहान, राजेंद्र सिंह, राम कुमार, रवि देवांगन, रवि यादव, रूपेश्वरी चंदेल, संदीप किंडो, सरिता साहू, शांति तिर्की, श्वेता इंदौरिया जैन, श्यामा शर्मा, सुनीता वर्मा, तरन गणेश ठाकुर, त्रिप्ति खरे, वंदना, विवेक सोलंकी, योगेश नेताम का नाम प्रमुख है।

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