क्या वाकई कमजोर पड़ रहे विजय बघेल, क्यों लेना पड़ रहा बड़े नेताओं का सहारा..!

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दुर्ग। दुर्ग संसदीय क्षेत्र के भाजपा प्रत्याशी विजय बघेल क्या वाकई इस चुनाव में इतने कमजोर हैं कि उन्हें राष्ट्रीय नेताओं का सहारा लेना पड़ रहा है । दुर्ग लोकसभा क्षेत्र में भाजपा के स्टार प्रचारकों की तीन बड़ी सभाएं हो चुकी है। जबकि कांग्रेस के राजेंद्र साहू के पक्ष में कोई भी स्टार प्रचारक अब तक नहीं पहुंचा है । 

 5 साल से विजय बघेल यहां सांसद है  । उनकी सरकार केंद्र में तो है ही छत्तीसगढ़ राज्य में भी आ चुकी है। इसके बावजूद भारतीय जनता पार्टी के दुर्ग सीट के प्रत्याशी विजय बघेल की घबराहट इन बातों से बयां हो रही है कि भारतीय जनता पार्टी के स्टार प्रचारको की सभा तीन स्थानों पर हो चुकी है । अमित शाह की सभा बेमेतरा में हुई । सतपाल महाराज, जेपी नड्डा भी आ चुके हैं और आगामी दिनों में किसी बड़े नेता की सभा दुर्ग लोकसभा क्षेत्र में संभावित है।
 सियासी प्रेक्षकों में सवाल उठ रहा है कि विजय बघेल भारतीय जनता पार्टी के इतने वरिष्ठ नेता है, इसके बावजूद अपने दमखम पर चुनाव जीतने की काबिलियत क्यों नहीं दिखा रहे। क्या वाकई में विजय बघेल इस बार इतने कमजोर है कि उन्हें अपनी चुनावी वैतरणी किनारा लगाने के लिए राष्ट्रीय नेताओं का सहारा लेना पड़ रहा है। लोग यह भी पूछ रहे हैं कि पिछले 5 सालों में विजय बघेल के पास क्या ऐसी बड़ी कोई उपलब्धि नहीं,  जिसके बलबूते वे आम लोगों के बीच पूरे जोश–खरोश के साथ जा सके। उन्हें जलेबी और डोसा बनाने की जरूरत क्यों पड़ रही है । क्या उन्हें पिछले 5 साल के अपने कार्यों पर विश्वास नहीं या फिर पिछले 5 साल में उन्होंने ऐसा कोई कार्य किया ही नहीं, जिसके दम पर आम जनता से समर्थन मांग 
सके ।
आज 18वीं लोकसभा चुनाव के मद्देनजर सियासी प्रेक्षकों का एक तबका मानता है कि हिंदी पट्टी राज्यों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वयं एक बड़ा सियासी चेहरा है । मोदी का फैक्टर इस चुनाव में बोल रहा है । तब दुर्ग संसदीय सीट के भाजपा प्रत्याशी विजय बघेल खुद को क्यों कमजोर पा रहे हैं ? जबकि उनके परंपरागत विरोधी पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल राजनांदगांव लोकसभा सीट पर अपने दम पर ताल ठोक कर वापस भी आ गए हैं। 
अब चूंकि भूपेश बघेल अपने निकटतम सहयोगी राजेंद्र साहू की चुनावी सीट पर दुर्ग में मोर्चा संभालने पहुंच गए हैं, तब विजय बघेल को यह खटका लगा हुआ है कि अपने दांवपेंच से भूपेश बघेल विजय बघेल को कहीं पटकनी ना दे दे।
कांग्रेस के प्रत्याशी राजेंद्र साहू पहली दफा संसद का चुनाव लड़ रहे हैं। वह कोई हाई प्रोफाइल मास लीडर भी नहीं । इसके बावजूद अपने सौम्य, सरल, सहज व्यवहार से आम मतदाता तक पहुंच रहे हैं । उनके पक्ष में न कोई फैक्टर है , न बताने के लिए कोई उपलब्धि । इसके बावजूद अपने संघर्ष व मेहनत के दम पर चुनावी लड़ाई लड़ रहे हैं । 
ऐसा लगता है जैसे राजेंद्र साहू की मेहनत रंग दिखाना शुरू कर चुकी है और विजय बघेल यह देखकर हड़बड़ा गए हैं । नहीं तो राजेंद्र साहू जैसे नए चेहरे का सामना करने के लिए विजय बघेल को बड़े-बड़े  नेताओं का सहारा क्यों लेना पड़ता?