आलेख::- अनुराग सिंह देव
-बंगाल में कट्टर विचार और हिंसा
यह सिर्फ कोई पिछले 15 वर्षा में ही हो रहा है, ऐसा नहीं है। 1906 में पुराने बंगाल के ढाका में जब मुस्लिम लीग की स्थापना हुई, उस समय से ही या उससे पहले से ही बंगाल में यह उन्मादी विचार सिर उठाने लगा था। कुछ वर्षो में ही बंगाल के इस्लामिक नेताओं ने पृथक मुस्लिम राष्ट्र का प्रस्ताव तैयार करना आरंभ कर दिया और 1940 में प्रस्ताव पारित भी कर दिया। धार्मिक आधार पर सीटों का विभाजन और धार्मिक आरक्षण का क्रियान्वयन और फिर तुर्की के मुस्लिम खलीफा के अधिकारों को पुनर्स्थापित करने खिलाफत आंदोलन के रूप में यह धार्मिक कट्टरता खुल कर सामने आने लगी। इसका कॉंग्रेस ने भी समर्थन किया। यहाँ तक कि एक धार्मिक कट्टर आंदोलन को कांग्रेस ने स्वतंत्रता संग्राम का खिलाफत आंदोलन बना दिया। कट्टरता इतनी बढ़ी कि 1946 में बँटवारे की मांग को लेकर कोलकाता और नुवाखाली में हिन्दुओं के खिलाफ डायरेक्ट एक्शन डे का आह्वान किया गया, जिसका परिणाम हज़ारों नरसंहार, आगजनी, बलात्कार के रूप में सामने आया। फिर 1947 में पाकिस्तान विभाजन की भयाक्रांत हिंसा में लाखों हिन्दुओं का कत्लेआम सभी को ज्ञात ही है। वर्तमान परिस्थितियों में इस पृष्ठभूमि में बंगाल के इन इस्लामिक कट्टरपंथी नेताओं की देन को नजर अंदाज नहीं किया जा सकता। भारत की आजादी के बाद पहले कॉंग्रेस, फिर वामपंथ और अब तृणमूल कांग्रेस; यह सब इनके ही सीधे वैचारिक और राजनैतिक नियंत्रण में रही है। इसलिए आज यदि संदेशखाली, मुस्लिम बहुल क्षेत्र में वर्षों से मंदिरों में ताले, माँ दुर्गा पूजा में विवाद हो रहा है। वसूली, तोला बाजी हो रही हैं तो वहीं इस विचार के जनक सलीमुल्ला खान, जिन्ना, फै़ज़लूल हक, शोहरावर्दी , अबुल हासिमे, गुलाम सर्वर आज भी बंगाल की राजनैतिक धमनियों में रक्त के साथ सोच के रूप में दौड़ रहे है। अब चुनाव आयोग, सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद बंगाल की जनता को 2026 में पहली बार निर्भीक होकर मतदान और अभिव्यक्ति का अवसर मिला तो परिणाम सब के सामने है। इसलिए यदि 4 मई 2026 को पश्चिम बंगाल के चुनाव परिणामों के बाद हिन्दू जनता खुशी से भावुक है, तो आप सोचिए ये स्वतंत्रता प्राप्ति का जश्न, दशकों बाद नहीं, सदियों बाद है।
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