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जिला एवं सत्र न्यायालय दुर्ग में एक दिवसीय विधिक कार्यशाला का सफल आयोजन

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दुर्ग। जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, दुर्ग एवं जिला अधिवक्ता संघ दुर्ग के संयुक्त तत्वावधान में जिला एवं सत्र न्यायालय दुर्ग के नवीन सभागार में जिला अधिवक्ता संघ के कनिष्ठ अधिवक्ताओं के लिए एक दिवसीय विधिक कार्यशाला का सफल आयोजन किया गया। कार्यशाला में न्यायिक अधिकारियों एवं अधिक संख्या में अधिवक्ताओं की उपस्थिति रही।

कार्यक्रम में प्रमुख रूप से प्रशांत पाराशर, द्वितीय जिला एवं अपर सत्र न्यायाधीश, दुर्ग तथा भूपेश कुमार बसंत, प्रथम व्यवहार न्यायाधीश वरिष्ठ श्रेणी एवं मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, दुर्ग उपस्थित रहे। इसके साथ ही जिला अधिवक्ता संघ की अध्यक्ष सुश्री नीता जैन, सचिव रविशंकर सिंह, उपाध्यक्ष  प्रशांत जोशी, कोषाध्यक्ष अनिल जायसवाल, अतिरिक्त विशेष लोक अभियोजक प्रकाश शर्मा तथा अनेक वरिष्ठ एवं कनिष्ठ अधिवक्ता उपस्थित थे।

कार्यशाला के दौरान प्रशांत पाराशर ने सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 की धारा 9, घोषणात्मक डिक्रियां तथा भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 4 के महत्वपूर्ण प्रावधानों पर विस्तृत एवं सरल व्याख्यान प्रस्तुत किया। उन्होंने इन विषयों की न्यायिक प्रक्रिया में उपयोगिता तथा अधिवक्ताओं के लिए इनके व्यावहारिक महत्व पर प्रकाश डालकर उनका मार्गदर्शन किया।

अपने संबोधन में जिला अधिवक्ता संघ की अध्यक्ष सुश्री नीता जैन ने कहा कि “अधिवक्ता का जीवन केवल डिग्री प्राप्ति तक सीमित नहीं है, उसकी वास्तविक यात्रा न्यायालय की चौखट पर पहला कदम रखते ही प्रारंभ होती है। इस यात्रा को दिशा देने हेतु सतत प्रशिक्षण अत्यंत आवश्यक है।”

वहीं अतिरिक्त विशेष लोक अभियोजक प्रकाश शर्मा ने स्वापक औषधि एवं मनःप्रभावी पदार्थ अधिनियम (NDPS Act) के विभिन्न प्रावधानों की विस्तृत व्याख्या की तथा अधिवक्ताओं को व्यावहारिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान की गई।

कार्यशाला के उपरांत प्रतिभागियों ने केंद्रीय जेल, दुर्ग के कैदियों तथा जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, दुर्ग के पैरालीगल वॉलेंटियर्स द्वारा निर्मित पेंटिंग प्रदर्शनी का अवलोकन किया। प्रदर्शनी में प्रस्तुत चित्रों में कैदियों की सृजनात्मक अभिव्यक्ति, आत्मचिंतन और सकारात्मक बदलाव की झलक स्पष्ट दिखाई दी। प्रत्येक कृति न केवल उनकी कलात्मक प्रतिभा का प्रमाण थी, बल्कि सुधार एवं पुनर्वास की दिशा में उठाए गए सार्थक कदमों का भी परिचायक बनी। उपस्थित अतिथियों एवं अधिवक्ताओं ने प्रदर्शनी की सराहना करते हुए कैदियों द्वारा प्रतिकूल परिस्थितियों के बीच भी कला के माध्यम से आत्मविकास के प्रयासों की प्रशंसा की। साथ ही पैरालीगल वॉलेंटियर्स की भूमिका को भी अत्यंत महत्वपूर्ण बताते हुए कहा गया कि उनके सतत एवं निरंतर प्रयासों ने इन रचनात्मक गतिविधियों को सफल बनाने में अहम योगदान दिया है।

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