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समता में ही धर्म है, तृष्णा में नहीं : साध्वी लब्धियशा श्री जी

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नगपुरा। पार्श्व तीर्थ नगपुरा में चल रही चातुर्मास प्रवचन श्रृंखला में साध्वी श्री लब्धियशा श्री जी ने श्री आचारांग सूत्र का उल्लेख करते हुए कहा कि “समता में ही धर्म है। जहाँ समभाव है, वहीं सच्चा धर्म है।”
उन्होंने कहा कि श्रमण भगवान श्री महावीर स्वामी ने भी फरमाया है कि सम्यक दृष्टि जीव अपने कर्तव्यों का निर्वाहन धाय माता की तरह करता है, जो कर्तव्यों का पालन तो करती है पर बच्चे के प्रति आसक्ति नहीं रखती। यही आसक्ति मोहनीय कर्म का बंधन करती है।

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धर्मसभा को संबोधित करते हुए साध्वी श्री ने कहा कि “आवश्यकताएँ कभी पूरी नहीं होतीं, तृष्णा कभी समाप्त नहीं होती। भले ही आपकी सभी अभिलाषाएँ पूरी हो जाएं, फिर भी जीवन का वास्तविक सार उसमें नहीं, बल्कि समता और साधना में है।”
उन्होंने आगे समझाया कि बाह्य उत्तेजनाओं के प्रति अपनी क्रिया-प्रतिक्रिया को नियंत्रित करना ही समभाव है। यदि कोई वस्तु हमें पीड़ा देती है तो वह वस्तु कारण नहीं, बल्कि हमारे उसके प्रति आकलन के कारण है। उन्होंने कहा कि मनुष्य घटनाओं से नहीं, अपितु उनके प्रति अपने दृष्टिकोण से प्रभावित होता है।

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साध्वी श्री ने मोहनीय कर्म के विषय में कहा कि जब तक जीवन भौतिकता में उलझा रहेगा, अशुचिता का ज्ञान होने पर भी उसमें आसक्ति बनी रहती है। गटर में पड़े शराबी की तरह जो गंदगी में भी आनंद मानता है, वही मोहनीय कर्म की गहराई है।
अंत में उन्होंने कहा कि “विषमता को स्वीकारना, विपरीत परिस्थितियों में भी समभाव रखना और अशुभ के प्रति प्रतिक्रिया न देना – यही समता का मार्ग है। इसके लिए ज्ञान के साथ विवेकयुक्त पुरुषार्थ आवश्यक है।”

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