हनुमान मंदिर मामले में चलाया जा रहा हस्ताक्षर अभियान

बिलासपुर । सिम्स चौक पर स्थित 40 साल पुराने हनुमान मंदिर को हटाने की कोशिश बिलासपुर नगर निगम के साथ कॉन्ग्रेस और कांग्रेस के नए महापौर रामशरण यादव के लिए भी गले की फांस बन चुकी है। दावा किया जा रहा है कि हाईकोर्ट के निर्देश पर और निगमायुक्त की कोशिशों से इस मंदिर को तोडऩे की का प्रयास किया गया लेकिन हिंदू संगठनों का आरोप है कि कांग्रेस की सरकार शहर में बनते ही जानबूझकर महापौर रामशरण यादव ने हिंदू भावनाओं को आहत करने के मकसद से सबसे पहले इस मंदिर को ही टारगेट बनाया।
बुधवार को नगर निगम का अमला इस मंदिर को तोडऩे पहुंचा था लेकिन लोगों के विरोध के कारण उसे उल्टे पांव भागना पड़ा। इधर नगर निगम ने दावा किया कि स्थानीय लोगों से बातचीत हो चुकी है और सभी इस बात पर सहमत हो चुके हैं कि इस मंदिर के ठीक पीछे  सिम्स के खाली उद्यान में नया मंदिर बना कर इस मंदिर को वहां स्थानांतरित कर दिया जाएगा लेकिन इसके उलट यहां विरोध कर रहे लोगों ने दो टूक कह दिया की यहां मृत वानर की समाधि है और मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा 40 साल पहले की जा चुकी है इसलिए हिंदू धर्म अनुसार मंदिर को कहीं और शिफ्ट नहीं किया जा सकता। विरोध करने वालों ने यह भी कहा कि बिलासपुर में सीएए के विरोध में शाहीन बाग बनाने की तैयारी की जा रही है पुलिस उन्हें हटाने की हिम्मत नहीं करती। बिलासपुर शहर में ही कई अवैध मजार है लेकिन निगम वहां फ़टक भी नहीं सकती लेकिन हिंदू आस्था पर प्रहार करना बिलासपुर नगर निगम के लिए आसान है। जिस जगह मंदिर मौजूद है वहां से संडे मार्केट के दुकानदारों को भी हटाया नहीं जा रहा जबकि उनमें से अधिकांश बांग्लादेशी व्यापारी है। ना ही पीछे के सडक़ को ही सही किया जा रहा है। जाहिर है एक मंदिर को हटा देने से यातायात व्यवस्था बहुत सुधरने वाली नहीं है लेकिन यहां तो खाने वाले दांत कुछ और हैं और दिखाने वाले दांत कुछ और। इसी मुद्दे पर गुरुवार को यहां हस्ताक्षर अभियान चलाया गया जिसमें बड़ी संख्या में शामिल लोगों ने विरोध में अपना हस्ताक्षर किया। खास बात यह रही कि मंदिर के पक्ष में अपना समर्थन देते हुए कई मुसलमानों ने भी यहां हस्ताक्षर किए। इन्हीं हस्ताक्षरो की बुनियाद पर मामले को कोर्ट ले जाने की तैयारी की जा रही है।
बिलासपुर जैसे शहर में हमेशा से अमन-चैन रहा है लेकिन कई बार सरकारी मशीनरी की हड़बड़ी और और अदूरदर्शिता के चलते इस तरह की घटनाएं हो जाती है जिससे यहा अमन-चैन को ग्रहण लगने लगता है। इन दिनों वैसे भी देश में हालात बड़े नाजुक है। ऐसे नाजुक वक्त पर बेवजह निगम ने मंदिर मुद्दे पर फैसला लेकर मधुमक्खी के छत्ते में हाथ डाल दिया है। बिलासपुर नगर निगम की जिम्मेदारी संभालने के बाद महापौर रामशरण यादव पर सबकी निगाहें टिकी हुई थी। उम्मीद थी कि वे शहर विकास के लिए कोई बड़े अभियान के साथ आगाज करेंगे लेकिन जिस तरह से वे आरंभ में ही मंदिर तोडऩे के विवाद में उलझ गए हैं उससे उनकी साख जरूर कम हुई है। शहर के युवा और हिंदू संगठन लगातार अपना विरोध दर्ज कराते हुए यहां प्रदर्शन कर रहे हैं ।जिनका दावा है कि किसी भी कीमत पर मंदिर को यहां से हटाने नहीं देंगे। जाहिर है अगर ऐसे में नगर निगम जिद पर अड़ जाए तो फिर टकराव को टालना मुमकिन नहीं होगा। बिलासपुर शहर में ऐसे कई मंदिर और अन्य धार्मिक स्थल है जो यातायात में बाधक है फिर भी उन्हें  आम लोगों ने सहजता से स्वीकार कर लिया है। क्योंकि मसला धार्मिक आस्था से जुड़ा हुआ है, इसलिए इस संवेदनशील मुद्दे पर फैसला लेने से पहले सभी बिंदुओं पर गौर करने की जरूरत है। शायद बिलासपुर नगर निगम के अधिकारी और नए महापौर इसमें चूक कर गए हैं, जो उन पर फिलहाल भारी पड़ता दिखाई पड़ रहा है।

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