-छत्तीसगढ़ में अपनी तरह की अनूठी है 18 भुजाओं वाली माता की प्रतिमा, प्रतिदिन साड़ी, आभूषण और पेंटिंग बदलकर दिए जाते हैं नए स्वरूप
-गुलाब टेंट, श्रीराम लाइट और भिलाई के आकाश फूल की आकर्षक सजावट बनी श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र
दुर्ग। छत्तीसगढ़ की धार्मिक नगरी दुर्ग के गंजपारा स्थित सत्तीचौरा दुर्गा मंदिर में क्वांर नवरात्रि के दौरान निभाई जाने वाली अनूठी परंपरा श्रद्धालुओं के बीच विशेष आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। यहां विराजित 18 भुजाओं वाली माता की प्रतिमा का पिछले 46 वर्षों से प्रतिदिन अलग-अलग स्वरूपों में श्रृंगार किया जा रहा है। खास बात यह है कि माता के श्रृंगार में केवल साड़ी और आभूषण ही नहीं बदले जाते, बल्कि प्रतिमा की पेंटिंग भी बदलकर माता को नया रूप दिया जाता है। मंदिर समिति के अनुसार, इस तरह प्रतिदिन प्रतिमा का श्रृंगार करने की परंपरा छत्तीसगढ़ में अपनी तरह की अनूठी परंपरा है।
सत्तीचौरा दुर्गा मंदिर में क्वांर नवरात्रि के अवसर पर पिछले 49 वर्षों से माता की प्रतिमा स्थापित की जा रही है। इनमें से पिछले 46 वर्षों से 18 भुजाओं वाली माता की प्रतिमा स्थापित करने और प्रतिदिन उनका अलग-अलग रूपों में श्रृंगार करने की परंपरा चली आ रही है। प्रतिदिन सुबह करीब 10 बजे से श्रृंगार की प्रक्रिया शुरू होती है। राजीव नगर निवासी हेमंत मानिकपुरी पिछले 46 वर्षों से माता का श्रृंगार करते आ रहे हैं। वे पूरी श्रद्धा और लगन के साथ माता की साड़ी का रंग बदलने से लेकर आभूषणों और प्रतिमा की साज-सज्जा तक का कार्य करते हैं। नवरात्रि के प्रत्येक दिन माता नए रंग और वेशभूषा में भक्तों को दर्शन देती हैं।
-1981 में शुरू हुई थी अनूठी परंपरा
समिति के सदस्य सुरेश गुप्ता एवं नरेंद्र गुप्ता ने बताया कि माता के प्रतिदिन श्रृंगार की परंपरा वर्ष 1981 में शुरू हुई थी। तब से लेकर आज तक यह क्रम निरंतर जारी है। बुजुर्गों द्वारा शुरू की गई इस परंपरा का आज समिति के सदस्य पूरी निष्ठा के साथ निर्वहन कर रहे हैं। माता के प्रतिदिन श्रृंगार पर लगभग 10 हजार रुपये खर्च किए जाते हैं। श्रृंगार की यह विशिष्ट परंपरा सत्तीचौरा मंदिर को दुर्ग ही नहीं, बल्कि पूरे छत्तीसगढ़ में अलग पहचान दिलाती है।
-गंजमंडी की प्रतिमा से जुड़ा है पुराना इतिहास
सत्तीचौरा मंदिर का इतिहास भी स्थानीय लोगों की आस्था से गहराई से जुड़ा हुआ है। पुराने लोगों के अनुसार, पहले सत्तीचौरा की माता की प्रतिमा गंजमंडी में स्थापित होने वाली माता की प्रतिमा के साथ विराजमान होती थी। दोनों प्रतिमाओं को बहनों के समान माना जाता है। बाद में अलग समिति का गठन होने के बाद सत्तीचौरा में माता की प्रतिमा की स्थापना अलग से की जाने लगी। आज भी प्रतिमा स्थापना के दौरान दोनों प्रतिमाओं को आमने-सामने से होकर एक बार अवश्य गुजारा जाता है। इस परंपरा को आज भी श्रद्धा और विश्वास के साथ निभाया जा रहा है।
-आकर्षक पंडाल, रोशनी और फूलों की सजावट ने मोहा मन
इस वर्ष सत्तीचौरा मंदिर में माता के दर्शन के साथ आकर्षक झांकी, भव्य पंडाल और रंग-बिरंगी रोशनी श्रद्धालुओं को आकर्षित कर रही है। नवरात्रि के प्रथम दिन से ही प्रतिदिन हजारों की संख्या में श्रद्धालु यहां पहुंचकर माता के दर्शन कर रहे हैं और चलित झांकी तथा आकर्षक सजावट का आनंद ले रहे हैं।
इस वर्ष पंडाल की सजावट गुलाब टेंट द्वारा की गई है, जबकि आकर्षक लाइटिंग की जिम्मेदारी श्रीराम लाइट ने संभाली है। वहीं, भिलाई के प्रसिद्ध सजावटकर्ता आकाश फूल द्वारा फूलों की विशेष सजावट की गई है। भव्य साज-सज्जा और प्रतिदिन बदलते माता के स्वरूप को देखने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु मंदिर पहुंच रहे हैं।
सत्तीचौरा मंदिर में वर्षों से चली आ रही यह परंपरा धार्मिक आस्था, सेवा और समर्पण का प्रतीक बन गई है। माता के प्रतिदिन बदलते स्वरूप के दर्शन श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण हैं। बुजुर्गों से मिली इस परंपरा को नई पीढ़ी तक पहुंचाने में समिति की भूमिका भी महत्वपूर्ण है।
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