होम / दुर्ग-भिलाई / केन्द्रीय जेल दुर्ग के निरीक्षण में ‘न्यायश्रुति’ और ‘ई-साक्ष्य’ पर विशेष जोर
दुर्ग-भिलाई
-प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश के. विनोद कुजूर ने बंदियों के अधिकारों, डिजिटल न्यायिक प्रक्रिया और सुधारात्मक व्यवस्थाओं की समीक्षा की
दुर्ग। न्याय केवल अदालत की चारदीवारी तक सीमित नहीं है, बल्कि जेल में निरुद्ध प्रत्येक व्यक्ति तक न्याय की प्रक्रिया समयबद्ध, पारदर्शी और प्रभावी रूप से पहुंचना चाहिए। इसी उद्देश्य के साथ प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश दुर्ग के. विनोद कुजूर ने मुख्यालय स्थित केन्द्रीय जेल दुर्ग का निरीक्षण किया। इस दौरान उन्होंने बंदियों के अधिकारों, विधिक सहायता, स्वास्थ्य, स्वच्छता, भोजन, प्रकरणों की स्थिति, पुनर्वास तथा आश्रित परिवारों की समस्याओं की व्यापक समीक्षा की। निरीक्षण में न्यायिक प्रक्रिया में तकनीक के प्रभावी उपयोग, विशेष रूप से ‘न्यायश्रुति’ एवं ‘ई-साक्ष्य’ से संबंधित पहलुओं पर विशेष जोर दिया गया।
-जेल से कोर्ट तक तकनीक के बेहतर उपयोग पर जोर
प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश ने कहा कि वर्तमान समय में न्यायिक प्रक्रिया में डिजिटल तकनीक और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य की भूमिका लगातार महत्वपूर्ण हो रही है। ऐसे में जेल प्रशासन, विधिक सहायता व्यवस्था और न्यायालयीन प्रक्रिया के बीच बेहतर तकनीकी समन्वय आवश्यक है।
निरीक्षण के दौरान ‘न्यायश्रुति’ के माध्यम से साक्ष्य एवं न्यायिक कार्यवाही से जुड़ी प्रक्रियाओं तथा ‘ई-साक्ष्य’ के माध्यम से इलेक्ट्रॉनिक एवं डिजिटल साक्ष्य के न्यायालयीन उपयोग की प्रक्रिया के संबंध में आवश्यक जानकारी एवं जागरूकता पर जोर दिया गया। इसका उद्देश्य तकनीक को न्याय से अलग व्यवस्था के रूप में नहीं, बल्कि न्याय को अधिक सुलभ, व्यवस्थित और प्रभावी बनाने के माध्यम के रूप में उपयोग करना है।
उन्होंने सजायाफ्ता बंदियों के अपील संबंधी प्रकरणों को अद्यतन रखने तथा उन्हें उनके प्रकरण की वर्तमान स्थिति से अवगत कराने के निर्देश जेल अधिकारियों को दिए। नव-आगंतुक बंदियों को उनके प्रकरण से संबंधित जानकारी प्राप्त करने की प्रक्रिया भी बताई गई। ऐसे बंदी जो निजी अधिवक्ता नियुक्त करने में सक्षम नहीं हैं, उन्हें जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के माध्यम से निःशुल्क विधिक सहायता एवं अधिवक्ता उपलब्ध कराए जाने की जानकारी दी गई।
-SPRUHA योजना के तहत आश्रित परिवारों की समस्याओं की जानकारी ली
निरीक्षण के दौरान NALSA की SPRUHA (Supporting Potential and Resilience of the Unseen, Held-back and Affected) Scheme, 2025 पर भी विशेष ध्यान दिया गया। प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश ने बंदियों से संवाद कर यह जानकारी ली कि उनके कारावास के दौरान उनके आश्रित पत्नी, बच्चों एवं वृद्ध माता-पिता को किन सामाजिक, आर्थिक एवं व्यवहारिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है।
उन्होंने आजीविका, बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य उपचार, भरण-पोषण और दैनिक आवश्यकताओं से जुड़ी समस्याओं की जानकारी ली। पात्र बंदियों एवं उनके आश्रित परिवारजनों की पहचान कर उन्हें जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के माध्यम से निःशुल्क विधिक सहायता उपलब्ध कराने तथा पात्रता के अनुसार केंद्र एवं राज्य शासन की विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं से जोड़ने के लिए आवश्यक कार्रवाई सुनिश्चित करने के निर्देश दिए।
-PLV के माध्यम से परिवारों तक पहुंचेगी सहायता
प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश ने निर्देशित किया कि पैरा लीगल वालेंटियर्स (PLVs) के माध्यम से बंदियों के आश्रित परिवारों का फील्ड स्तर पर सत्यापन कराया जाए। उनकी वास्तविक समस्याओं की पहचान कर संबंधित विभागों के साथ समन्वय स्थापित किया जाए, ताकि सहायता केवल जेल परिसर तक सीमित न रहे, बल्कि जरूरतमंद परिवारों तक जमीनी स्तर पर पहुंचे।
-स्वास्थ्य, गरिमा और पुनर्वास को भी प्राथमिकता
निरीक्षण के दौरान ऐसे बंदियों की जानकारी जिला विधिक सेवा प्राधिकरण को उपलब्ध कराने के निर्देश दिए गए, जिन्हें परिहार का लाभ प्राप्त हो सकता है और जिनके आवेदन लंबित हैं।
निरीक्षण के उपरांत अधिकारियों को उच्चतम न्यायालय द्वारा शंकर महतो प्रकरण में प्रतिपादित सिद्धांतों एवं दिशा-निर्देशों का पालन सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए। मानवीय गरिमा, स्वच्छता, स्वास्थ्य, पोषण, मानसिक स्वास्थ्य, सुरक्षा, विधिक सहायता एवं पुनर्वास से संबंधित व्यवस्थाओं को प्राथमिकता देते हुए आवश्यक सुधारात्मक उपाय निरंतर किए जाने पर जोर दिया गया।
-न्यायिक व्यवस्था के कई आयामों की हुई समीक्षा
केन्द्रीय जेल दुर्ग का निरीक्षण केवल जेल की भौतिक व्यवस्थाओं के अवलोकन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसमें बंदियों के अधिकार, उनके परिवारों की समस्याएं, विधिक सहायता, डिजिटल न्यायिक प्रक्रिया और पुनर्वास जैसे न्याय व्यवस्था के विभिन्न पहलुओं की एक साथ समीक्षा की गई।
‘न्यायश्रुति’ और ‘ई-साक्ष्य’ जैसे तकनीकी माध्यमों के प्रभावी उपयोग पर जोर इसी व्यापक दृष्टिकोण का हिस्सा रहा, जिसमें तकनीक का उद्देश्य न्यायिक प्रक्रिया को अधिक प्रभावी, पारदर्शी और सुलभ बनाना है।
निरीक्षण के दौरान मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट भूपेश कुमार बसंत, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण दुर्ग के सचिव उमेश कुमार भागवतकर, जेल अधीक्षक सहित जेल के अन्य अधिकारी एवं कर्मचारी उपस्थित रहे।
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सम्पूर्ण न्यायिक प्रकरणों के लिये न्यायालयीन क्षेत्र दुर्ग होगा।
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