
भिलाई। राष्ट्रवाद के प्रणेता डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की 125वीं जयंती के उपलक्ष्य में प्रबुद्ध परिषद छत्तीसगढ़ एवं ग्रामोदय के संयुक्त तत्वावधान में रविवार को "वर्तमान भारत को डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का प्रदेय" विषय पर वैचारिक संगोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम के मुख्य वक्ता छत्तीसगढ़ साहित्य अकादमी के अध्यक्ष शशांक शर्मा थे। संगोष्ठी की अध्यक्षता डॉ. हंसा शुक्ला ने की, जबकि विषय प्रवर्तन डॉ. ज्योति धारकर ने किया। कार्यक्रम के अंत में ग्रामोदय की सचिव श्रीमती सुमन कन्नौजे ने आभार प्रदर्शन किया।
कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्ज्वलन एवं डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के तैलचित्र पर माल्यार्पण के साथ हुआ। प्रबुद्ध परिषद के अध्यक्ष अजय डांगे ने अतिथियों का स्वागत किया।
मुख्य वक्ता शशांक शर्मा ने अपने संबोधन में कहा कि डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के योगदान को इतिहास में अपेक्षित स्थान नहीं मिला। उन्होंने कहा कि डॉ. मुखर्जी ने परिवार का मोह त्यागकर राष्ट्रसेवा को अपना जीवन समर्पित किया। उन्होंने देश की पहली उद्योग नीति (1948) तैयार करने, चित्तरंजन लोकोमोटिव, सिंदरी उर्वरक कारखाना तथा हिंदुस्तान एयरक्राफ्ट की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने पूंजी और श्रम के बीच संतुलन तथा श्रमिकों को उद्योगों के लाभ में भागीदारी देने की अवधारणा भी प्रस्तुत की।
श्री शर्मा ने कहा कि डॉ. मुखर्जी ने हैदराबाद और कश्मीर के भारत में विलय, राज्यों के पुनर्गठन, मजबूत विपक्ष की आवश्यकता तथा भारतीय जनसंघ की स्थापना के माध्यम से लोकतंत्र को नई दिशा दी। उन्होंने कश्मीर को विशेष दर्जा दिए जाने और परमिट व्यवस्था का विरोध करते हुए "एक देश में दो विधान, दो प्रधान और दो निशान नहीं चलेंगे" का नारा दिया तथा इसी संघर्ष के दौरान श्रीनगर में उनका बलिदान हुआ। उन्होंने उपस्थित जनों से बलराज मधोक द्वारा लिखित "डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी: ए बायोग्राफी" पढ़ने का भी आग्रह किया।
प्रबुद्ध परिषद छत्तीसगढ़ के प्रांत संयोजक अतुल नागले ने स्वागत उद्बोधन में प्रज्ञा प्रवाह का परिचय देते हुए कहा कि समाज में तथ्यपरक और सकारात्मक वैचारिक विमर्श स्थापित करना प्रबुद्ध परिषद का उद्देश्य है। उन्होंने छत्तीसगढ़ में परिषद की गतिविधियों की जानकारी भी दी।
विषय प्रवर्तन करते हुए डॉ. ज्योति धारकर ने कहा कि डॉ. मुखर्जी केवल कुशल राजनेता ही नहीं, बल्कि विलक्षण विद्यार्थी और शिक्षाविद भी थे। मात्र 33 वर्ष की आयु में कुलपति बनने का गौरव उन्हें प्राप्त हुआ और कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग बनाए रखने के लिए उन्होंने अपना सर्वोच्च बलिदान दिया।
अध्यक्षीय उद्बोधन में डॉ. हंसा शुक्ला ने कहा कि डॉ. मुखर्जी ने शिक्षा के साथ संस्कारों को भी समान महत्व दिया। उन्होंने कहा कि आज समाज में संस्कारों की आवश्यकता पहले से अधिक है और युवाओं तक तथ्यपूर्ण इतिहास एवं महापुरुषों के विचार पहुंचाना समय की मांग है।
कार्यक्रम के अंत में श्रीमती सुमन कन्नौजे ने सभी अतिथियों, वक्ताओं एवं उपस्थित प्रबुद्धजनों का आभार व्यक्त करते हुए बताया कि भविष्य में भी प्रतिमाह इस प्रकार की वैचारिक संगोष्ठियों का आयोजन किया जाएगा, ताकि समाज में स्वस्थ और तथ्यपरक वैचारिक संवाद को बढ़ावा मिल सके।
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