दुर्ग-भिलाई

हटरी बाजार में समय के थपेड़ों के बीच खड़ा एक अद्भुत बरगद बना आकर्षण का केंद्र

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दुर्ग। हटरी बाजार स्थित वह स्थान, जहाँ कभी सुराणा धर्मशाला हुआ करती थी, लंबे समय से विवाद के कारण चर्चा में रहा। हाल ही में यह विवाद सुलझने के बाद परिसर में सफाई एवं मलबा हटाने का कार्य प्रारंभ किया गया। इसी दौरान एक ऐसा दृश्य सामने आया जिसने स्थानीय नागरिकों और राहगीरों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर लिया।
मलबे और दीवारों के सहारे वर्षों से बढ़ता हुआ एक बरगद का लगभग 35 फीट ऊंचा पेड़ अब एक सुंदर और अनोखी आकृति में विकसित हो चुका है।
 समय की मार और परिस्थितियों के अनेक थपेड़ों के बावजूद इस पेड़ ने जिस प्रकार स्वयं को सुरक्षित और सशक्त बनाए रखा, वह प्रकृति की अद्भुत जीवटता का प्रतीक बनकर सामने आया है।
सफाई के दौरान जब मलबा हटाया गया तो यह पेड़ अपनी पूरी भव्यता के साथ दिखाई दिया। इसकी प्राकृतिक बनावट और दीवारों के साथ उसका सामंजस्य एक बेहद मनमोहक दृश्य प्रस्तुत कर रहा है। यही कारण है कि अब यह स्थान लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र बन गया है। बड़ी संख्या में नागरिक यहां पहुंचकर इस अनोखे दृश्य को देख रहे हैं और इसकी तस्वीरें भी ले रहे हैं।
इस विलक्षण दृश्य से प्रेरित होकर हमारे प्रतिनिधि ने इस बरगद पर एक भावपूर्ण कविता भी रची है, जो प्रकृति की दृढ़ता और समय के साथ उसके संघर्ष की कहानी को अभिव्यक्त करती है।
यह दृश्य न केवल प्रकृति की अदम्य शक्ति का उदाहरण है, बल्कि यह संदेश भी देता है कि कठिन परिस्थितियों के बीच भी जीवन अपनी राह बना ही लेता है।___
दीवार से लिपटा यह पेड़
जैसे समय की उँगली पकड़कर खड़ा है,
ईंटों की दरारों में अपनी जड़ें जमाए
हर पत्थर से कह रहा है —
“मैं हारना नहीं जानता।”
कभी यह घर भी साँस लेता होगा,
इन खिड़कियों से सुबह उतरती होगी,
और शामें चुपके से
दीपक की लौ में सिमट जाती होंगी।
वह खिड़की…
धूल की चादर ओढ़े हुए,
अब भी शायद इंतज़ार करती है-
किसी आहट का,
किसी लौटते कदमों का,
किसी ऐसे नाम का
जो कभी हर दीवार पर गूँजता था।
हवा जब शाखों को छूकर गुजरती है,
तो लगता है जैसे
पुराने दिनों की हँसी
धीरे-धीरे फिर से जन्म ले रही हो।
यह पेड़ नहीं, एक जिद है—
बीते हुए कल को बचाए रखने की,
और यह खिड़की नहीं,
एक याद है…
जो अब भी खुलना चाहती है।
( रविन्द्र जैन "सुमन" )

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