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संसार का सबसे बड़ा तप ब्रह्मचर्य है : राष्ट्रसंत मणिभद्र मुनि

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-आचार्य सम्राट आनंदऋषि जी महाराज की 126वीं जन्म जयंती 16 अगस्त को मनाई जाएगी  
      
दुर्ग
। जय आनंद मधुकर रतन भवन, बांधा तालाब दुर्ग में चल रहे आध्यात्मिक वर्षावास के अंतर्गत आयोजित धर्मसभा को संबोधित करते हुए राष्ट्रसंत मानव मिलन के संस्थापक मणिभद्र मुनि जी महाराज ने कहा कि संसार का सबसे बड़ा तप ब्रह्मचर्य है। ब्रह्मचर्य का वास्तविक अर्थ केवल इंद्रियों पर नियंत्रण करना नहीं, बल्कि आत्मा में रमण करना है। जब मनुष्य बाहरी आकर्षणों से हटकर अपने भीतर की आत्मिक शक्ति को पहचानता है, तभी उसका जीवन सार्थक बनता है।
मुनिश्री ने कहा कि साधु को केवल आदेश नहीं, बल्कि उनके संदेश को आत्मसात करना चाहिए। संतों के जीवन और उनके उपदेशों को अपने आचरण में उतारने से ही मानव जीवन भवसागर से पार होने की दिशा में आगे बढ़ सकता है। धर्म केवल सुनने का विषय नहीं, बल्कि उसे जीवन में उतारने का माध्यम है।  ‌             
इस अवसर पर राष्ट्रसंत मणिभद्र मुनि जी महाराज ने आचार्य सम्राट आनंदऋषि जी महाराज के सानिध्य में बिताए अपने जीवन के महत्वपूर्ण पलों को स्मरण करते हुए उनके साथ जुड़े अनेक प्रेरणादायी संस्मरण धर्मसभा में साझा किया 
क्रोध दूसरों की गलती की सजा स्वयं को देना है : साध्वी डॉ. सृजना श्री             
ईर्ष्या से बचने के लिए तुलना छोड़ें, निंदा से पहले स्वयं का निरीक्षण करें
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जय आनंद मधुकर रतन भवन की धर्म सभा को संबोधित करते हुए साध्वी डॉक्टर सृजन श्री ने भावपूर्ण ढंग से कहा, “जो स्वयं जलता है और दूसरों को जलाता है, वह क्रोध है। जो स्वयं जलता है, लेकिन दूसरों को नहीं जलाता, वह ईर्ष्या है। जो स्वयं नहीं जलता, लेकिन दूसरों को जलाता है, वह निंदा और चुगली करने वाला है। और जो स्वयं भी नहीं जलता तथा दूसरों को भी नहीं जलाता, वही क्षमाशील व्यक्ति है।”
साध्वीश्री ने कहा कि क्रोध पर विजय क्रोध से नहीं, बल्कि क्षमा से प्राप्त की जा सकती है। जब व्यक्ति क्षमा को अपने जीवन का हिस्सा बना लेता है, तब उसके भीतर शांति और सहजता का विकास होता है। उन्होंने कहा कि जितना अधिक हम दूसरों से अपनी तुलना करेंगे, उतनी ही ईर्ष्या को जन्म देंगे। इसलिए जीवन में तुलना से बचना चाहिए और अपनी क्षमताओं, गुणों तथा आत्मिक विकास पर ध्यान देना चाहिए।
उन्होंने निंदा और चुगली की प्रवृत्ति पर प्रकाश डालते हुए कहा कि दूसरों की कमियां देखने से पहले मनुष्य को स्वयं के भीतर झांकना चाहिए।
जन्म जयंती के अवसर पर 1008 सामायिक का लक्ष्य रखा गया है। मुनिश्री ने श्रावक-श्राविकाओं से अधिक से अधिक संख्या में सामायिक कर इस आध्यात्मिक आयोजन को सफल बनाने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि आचार्य सम्राट के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हम उनके बताए मार्ग पर चलें और अपने जीवन में संयम, साधना एवं आत्मचिंतन को स्थान दें।
धर्मसभा में बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाओं ने उपस्थित होकर मुनिश्री एवं साध्वी जी के प्रवचन का लाभ लिया।
कल के नवकार महामंत्र जप अनुष्ठान प्रकाश चंद प्रफुल्ल कुमार संचेती परिवार की ओर से सम्पन्न होगा

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