होम / दुर्ग-भिलाई / माहे रमजान के दिन-रात बीत रहे खास इबादत में
दुर्ग-भिलाई
-रोजा रखने के साथ दिनचर्या बदल गई है ज्यादातर घरों में
भिलाई। माहे रमजान जारी है और इन दिनों रोजेदारों की दिनचर्या भी बदल गई है। रोजा रखते हुए खास इबादत में लोग डूबे हैं। रोजाना सहरी के वक्त सुबह उठने से लेकर शाम को इफ्तार और रात में विशेष नमाज तरावीह में लोग अपनी भागीदारी दे रहे हैं। रमजान के इस खास महीने की अजमत को देखते हुए लोग इबादत के साथ-साथ दूसरी तैयारियों में भी व्यस्त हैं। मस्जिदों में नमाजियों की तादाद बढ़ गई है, वहीं अफ्तार के वक्त लोग एक साथ रोजा खोलने जुट रहे हैं।
मस्जिद आयशा हाउसिंग बोर्ड भिलाई के इमाम व खतीब मौलाना सैय्यद फैसल अमीन कहते हैं कहा कि इसी महीने में अल्लाह ने अपने आखिरी नबी हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहिस्सलाम पर पवित्र कुरान नाजिल की और इसे तेइस साल में पूरा किया गया। इस महीने के रोजों को फ़र्ज़ किया गया है। मुफ्ती मोहम्मद सोहेल काजी दारूल कजा भिलाई कहते हैं रोजा पाबंदी से रखना चाहिए क्योंकि यह हर बालिग मर्द और औरतें पर फ़र्ज़ है। अगर कोई बीमार है या सफ़र में है तो उसको कुछ छूट है लेकिन बाद में उसकी भरपाई जरूर करे। जब बीमार सेहतमंद हो जाए और मुसाफिर अपने मुकाम पर पहुंच जाए। शेखुल हदीस मौलाना जकरिया रहमतुल्लाह अलैहि ने अपने रिसाले फजाईले रमजान मुबारक मे लिखा है कि खुदा की तरफ़ से अपने बंदों पर रमजान बहुत बड़ा इनाम है। इस महीने में खुद रोजा रखे ,अहकामे खुदावन्दी पूरा पूरा अदा करें। पांच वक्त की नमाज़ पढ़ने के साथ तिलावत कुरान करें जो सारे इंसानियत के लिए हिदायत (सीधा रास्ता) बताने वाली है। मदरसा ताज उल उलूम रूआबांधा भिलाई के प्रिंसिपल मुहम्मद शाहिद अली मिस्बाही कहते हैं रमजान सिर्फ़ रोज़ा रखने का नाम नहीं, बल्कि आत्मा की शुद्धि, सब्र की परीक्षा और इंसानियत की सेवा का महीना है। यह महीना हमें अपने रब से जुड़ने, अपने दिल को साफ़ करने और समाज के कमजोर तबकों के प्रति जिम्मेदारी निभाने का संदेश देता है। रमज़ान का असली पैग़ाम सब्र है। दिन भर की भूख-प्यास इंसान को यह एहसास दिलाती है कि समाज में कितने लोग ऐसे हैं जो रोज़ाना इसी हालात से गुजरते हैं। जब इंसान खुद भूखा रहता है तो उसे गरीब और जरूरतमंद लोगों का दर्द समझ में आता है। यही एहसास उसे दूसरों की मदद के लिए प्रेरित करता है। इस महीने में जकात, सदका और फितरा देने की खास हिदायत है, ताकि समाज में आर्थिक संतुलन बना रहे और कोई भी व्यक्ति भूखा न सोए। रमज़ान रहमत और बरकत का महीना है। इस महीने में की गई इबादतों का सवाब कई गुना बढ़ा दिया जाता है।
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