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महाप्रभु वल्लभाचार्य के अवतरण की पावन भूमि भी है छत्तीसगढ़

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-चम्पारण के सफल सांस्कृतिक -साहित्यिक भ्रमण के बाद बताया आचार्य डॉ.शर्मा ने
भिलाई/
साहित्याचार्य, शिक्षाविद् एवं लेखक आचार्य डॉ.महेशचन्द्र शर्मा हाल ही में चम्पारण की सफल सांस्कृतिक और साहित्यिक यात्रा कर लौटे। देश-विदेश की अनेक शैक्षणिक और सफल साहित्यिक यात्रायें पूरी कर अनेक पुस्तकों के लेखक आचार्य डॉ. शर्मा ने बताया कि चम्पा पुष्पों की अधिकता वाले वनों और उपवनों के कारण छत्तीसगढ़ की पावन धरती चम्पारण्य कहलाती थी। इस आध्यात्मिक यात्रा में डॉ. शर्मा की पत्नी श्रीमती रजनी गौरी शर्मा भी साथ थीं। 
डॉ. शर्मा ने बताया कि इसी पावन भूमि पर ही शताब्दियों पहले महाप्रभु वल्लभाचार्य अवतरित हुये। चम्पारण तीर्थ स्थल राजधानी से 50 कि.मी.  दूरी पर स्थित है । स्वयंभू चम्पेश्वर शिव के अलावा यहां श्री राम एवं  श्री कृष्ण  आदि के भी भव्य मंदिर हैं। महादेव  शिव यहां के  इष्टदेव हैं। प्राकृतिक वनस्पतियों और  बड़ी संख्या में गौशालाओं के कारण ये  छत्तीसगढ़ का वृन्दावन भी कहलाता है।          
उन्होंने बताया कि   पिता पं.लक्ष्मण भट्ट और माता इल्लिमा गारु के दिव्य पुत्र वल्लभाचार्य ने अपने गुरु पं.नारायण भट्ट आदि से ग्यारह वर्ष की किशोरावास्था में ही वेद-वेदान्त की शिक्षा प्राप्त कर ली थी। वे अधिकांश समय काशी, प्रयागराज और मथुरा - वृन्दावन की यात्रा में रहते थे। इसी दौरान उन्होंने सूरदास को भक्ति ज्ञान दिया। वे स्वयं 84 बार भागवत महापुराण का पारायण कर चुके थे। हिन्दी साहित्य में भक्तिकाल को स्वर्ण युग कहा जाता है। श्रीकृष्ण के अनन्य भक्त महाकवि सूरदास और उनका सूरसागर विश्वप्रसिद्ध है। महाप्रभु वल्लभाचार्य की प्रेरणा से ही सूरदास जी ने कालजयी रचना यें की।  आचार्य डॉ.महेशचन्द्र शर्मा ने बताया कि अपनी  संस्कृति परक प्रकाशित पुस्तक "छत्तीसगढ़ में संस्कृत" में भी चम्पारण्य एवं महाप्रभु वल्लभाचार्य के विषय में लिखा है। श्री राम वनवास के अधिकाश वर्षों में छत्तीसगढ़ के दण्डकारण्य आदि स्थानों में रहे। इस लिये राम वन गमन पर भी कार्य चल रहा है।  वह मार्ग भी चम्पारण से गुजरता है।

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