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गीता सार: गीता ही कृष्ण है कृष्ण ही गीता है- संत निरंजन महाराज जी

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-श्रीमद् भागवत कथा के समापन पर हुआ हवन यज्ञ भंडारे में हजारों श्रद्धालुओं ने पाई  प्रसादी, भक्ति और सत्य के मार्ग पर चलने का दिया संदेश
दुर्ग।
पूर्व गृहमंत्री ताम्रध्वज साहू  धर्मपत्नी श्रीमती स्व.कमला देवी साहू जी की पुण्य स्मृति में  आयोजित ग्राम पाऊवारा में चल रही श्रीमद् भागवत कथा के अंतिम दिवस हवन यज्ञ के बाद विशाल भंडारे का आयोजन किया गया। जिसमें दूर-दूर से आए श्रद्धालुओं ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। भंडारे में हजारों की संख्या में श्रद्धालु  प्रसादी ग्रहण करने पहुंचे। भगवान के जयकारों और भक्ति-भाव के माहौल के बीच श्रद्धालुओं ने प्रेमपूर्वक प्रसाद ग्रहण किया।
आयोजन प्रदेश के पूर्व गृहमंत्री ताम्रध्वज साहू ने बताया कि यह आयोजन पिछले नौ दिनों से चल रहा था, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु श्रीमद् भागवत कथा का श्रवण करने आए। श्रीमद् भागवत कथा ने पूरे क्षेत्र को भक्ति और आनंदमय वातावरण से भर दिया। उन्होंने सबका आभार व्यक्त किया।

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श्रद्धालुओं ने भगवान से अपने परिवार और समाज के कल्याण की प्रार्थना की।
कथा के अंतिम दिन कथा वाचक संत निरंजन महाराज जी ने कहा की महाभारत युद्ध में भी गीता जी का प्राकटय  हुआ  कर्मयोग भक्ति योग ज्ञान योग का संदेश गीता में है।जीवन संग्राम में विजय पाने के लिए गीता माता के शरण में होना होगा। गीता के अठारह अध्याय में योगों वर्णन है।
योग का तात्पर्य हमें गीता से प्राप्त होता है कालान्तर में बड़े-बड़े महाऋषि संत मिलकर तय किये विश्व का सबसे बड़ा दर्शन है गीता सबसे अधिक भाषाओ में अनुवादित है गीता धर्म को सदैव बड़ा मानने वाले पाण्डवों ने धर्म के पक्ष में खड़े होकर विजयी हुए धृतराष्ट को मोह और दुर्योधन की दृस्टिता महाभारत के युद्ध के कारण बना।

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धृतराष्ट्र नीति का कभी समर्थन नहीं किया।मोह और स्वार्थ से पीड़ित व्यक्ति को नीति धर्म कभी अच्छा नही लगता अधर्म और अनीति पथ में चढ़ने वाले व्यक्ति सम्पन्न दिखता हैं लेकिन अन्दर से अशांत, भयभीत और असन्तुष्ट रहता है और सदा कमजोर रहता है। शुभाशुभ कर्म के फलस्वरुप व्यक्ति दुःख और सुख भोकता है जीवन मात्र के कर्मो के फल स्वरूप ही जीवन मिलता है। संत निरंजन महाराज जी ने कथा में आगे बताया की निरंतर फल की इच्छा रखने वाले स्वार्थ और मोह से ऊपर उठकर  परमात्मा का चिन्तन करना चाहिए। श्रद्धा एवं भक्ति से जीवन जीकर फल लिए निश्चिंत रहना चाहिए। और निश्वित जीवन व्यतीत करना चाहिए।

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सांसारिक सुखों का मन से त्याग और व्यवहारिक जीवन आध्यात्म को स्थान देकर सुखमय जीवन व्यतीत कर सकते हैं। सामाजिक समरसता, स्नेह और सदभावना ही गीता जी का संदेश है युद्ध के मैदान में रहकर भी  अर्जुन निर्भीक, निश्चीत और शांत रहे। जीवन रथ का बागडोर परमात्मा के हाथों में छोडकर सम्पूर्ण जीवन को रसमय बनाकर उत्साह पूर्वक जीवन जीयें यही गीता जी का संदेश है।  विवेकानंद जी कहते थे निस्वार्थ  है वह ही धर्म की कसौटी है जो जितना निस्वार्थी है वह उतना ही बड़ा धर्मत्मा है।इस भागवत कथा में समस्त ग्रामवासी, परिवार जनों सहित सैकड़ो संख्या में श्रोता गण मौजूद थे।

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