-“माता-पिता को अपने सत्कर्मों से तृप्त करना ही तर्पण है” - आचार्य डॉ. अजय आर्य
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भिलाई। पितृपक्ष हमें अपने पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के साथ-साथ उनके संस्कारों को अपने जीवन में उतारने की प्रेरणा देता है। श्रद्धा जब सेवा का रूप लेती है और स्मृतियां परोपकार का माध्यम बनती हैं, तभी उनका वास्तविक महत्व सामने आता है। इसी भावपूर्ण उद्देश्य के साथ शिशिर कुमार मिश्रा एवं श्रीमती बीना मिश्रा ने अपने पिताजी की स्मृति में रामशिला की कुटिया में अन्नदान एवं सेवा कार्यक्रम आयोजित किया। इस अवसर पर बुजुर्गों को फल एवं बिस्किट वितरित किए गए तथा जलपान में इडली, सांभर एवं बड़ा परोसा गया। साथ ही बुजुर्गों से आत्मीय संवाद कर उनका कुशलक्षेम जाना और उनके जीवनानुभवों को सुना गया।
कार्यक्रम में महेश कुमार गजेंद्र, सुशील सिन्हा गजेंद्र, आचार्य डॉ. अजय आर्य एवं नमित क्षत्रिय ने सेवा कार्य में सहभागिता की। सभी ने बुजुर्गों के साथ समय बिताकर उनके प्रति सम्मान, संवेदना और आत्मीयता व्यक्त की। इस अवसर पर यह अनुभूति भी सामने आई कि किसी को भोजन कराना शरीर की आवश्यकता पूरी करना है, लेकिन उसके पास बैठकर उसकी बात सुनना, उसके सुख-दुख को समझना और उसे अपनत्व देना उसकी आत्मा को प्रसन्न करने जैसा है। सेवा का वास्तविक सौंदर्य इसी संवेदनशीलता में निहित है।
-सत्कर्म ही सच्चा तर्पण
इस अवसर पर आचार्य डॉ. अजय आर्य ने कहा कि “माता-पिता को अपने सत्कर्मों से तृप्त करना ही तर्पण है।”उन्होंने कहा कि श्राद्ध का संबंध केवल किसी निर्धारित तिथि पर किए जाने वाले कर्मकांड से नहीं, बल्कि श्रद्धा, कृतज्ञता और सदाचार से भी है। पूर्वजों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि यही है कि हम उनके आदर्शों को अपने आचरण में जीवित रखें, जरूरतमंदों की सहायता करें और बुजुर्गों को सम्मानपूर्ण जीवन देने का प्रयास करें। जीवित माता-पिता की सेवा, उनकी भावनाओं का सम्मान और उनके चेहरे पर प्रसन्नता लाना किसी भी औपचारिकता से अधिक मूल्यवान है। पितरों की स्मृति यदि हमें परोपकार की ओर प्रेरित करती है, तो वह स्मृति हमारे जीवन को भी श्रेष्ठ बनाती है और समाज में संवेदना का विस्तार भी करती है।
शिशिर कुमार मिश्रा ने अपने अनुभव साझा करते हुए अपने पिताजी की स्मृतियों का भावपूर्ण उल्लेख किया। उन्होंने पिताजी की स्मृति में सेवा कार्य आयोजित करने के भाव को व्यक्त करते हुए बताया कि प्रियजनों की याद को समाजहित के कार्यों से जोड़ना उनके प्रति सम्मान प्रकट करने का एक सार्थक माध्यम है।
रामशिला की कुटिया में आयोजित यह सेवा कार्यक्रम इस संदेश के साथ संपन्न हुआ कि पितृपक्ष केवल अतीत को याद करने का अवसर नहीं, बल्कि वर्तमान में अपने कर्तव्यों को पहचानने का भी समय है। पूर्वजों के प्रति सच्ची श्रद्धा उनके नाम पर किए गए सत्कर्मों, जरूरतमंदों की सहायता और बुजुर्गों के सम्मान में दिखाई देती है। पुष्प अर्पित करना श्रद्धा का प्रतीक हो सकता है, लेकिन किसी के जीवन में प्रसन्नता भरना श्रद्धा की सजीव अभिव्यक्ति है। यही सेवा का संस्कार है और यही पितृ-स्मरण की सार्थकता।
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