दुर्ग। आध्यात्मिक वातावरण में चल रहे पर्युषण पर्व का आज अंतिम दिवस संवत्सरी महापर्व के रूप में श्रद्धा, साधना, तपस्या, त्याग और आत्मचिंतन के साथ मनाया गया। इसी श्रृंखला में जय आनंद मधुकर रतन भवन, बांधा तालाब, दुर्ग में भी पर्युषण पर्व के दौरान धर्म-ध्यान, त्याग, तपस्या एवं जप-अनुष्ठान की आराधना निरंतर चलती रही।
धर्मसभा को संबोधित करते हुए राष्ट्र संत डॉ. मणिभद्र मुनि जी महाराज ने कहा कि मानव स्वभाव से आनंद-पिपासु और उत्सवप्रिय है, लेकिन गृहस्थ जीवन की अनेक चिंताएं उसे चारों ओर से घेरे रहती हैं। जब मनुष्य इन चिंताओं से मुक्त होकर आनंद में निमग्न होता है, तब जीवन में एक नई बहार आती है और जीवन के प्रत्येक क्षण में आनंद की अनुभूति होने लगती है। ऐसी आनंदमयी तिथियों को ही पर्व कहा जाता है।
उन्होंने कहा कि हर देश और हर समाज में पर्व आनंद एवं उल्लास के साथ मनाए जाते हैं। किसी समाज की जीवंतता और उत्साह का आकलन उसके पर्व एवं त्योहारों से किया जा सकता है। भारत का सौभाग्य है कि यह ऋषि एवं कृषि की भूमि होने के साथ-साथ उत्सवों और त्योहारों की भी भूमि है। यहां पर्वों की समृद्ध परंपरा रही है। ‘सात वार नौ त्योहार’ की लोकोक्ति भी भारत की इसी उत्सवप्रिय संस्कृति को दर्शाती है।
-तपस्वियों का हुआ भावपूर्ण अभिनंदन
संवत्सरी महापर्व के अवसर पर धर्मसभा में तपस्या करने वाले साधकों का अभिनंदन भी किया गया। इस दौरान पारिवारिक रिश्तों में तपस्या के प्रति श्रद्धा और सम्मान का अद्भुत दृश्य देखने को मिला। मामा-भांजे, देवरानी-जेठानी, पिता-पुत्र, भाई-भाई, पति-पत्नी तथा सास-बहू की जोड़ियों ने एक-दूसरे की तपस्या का अभिनंदन कर साधकों का उत्साहवर्धन किया।
मामा-भांजे की जोड़ी में कांतिलाल पारख ने विक्रम, देवरानी-जेठानी की जोड़ी में इंदिरा ने सरल बोहरा, पिता-पुत्र की जोड़ी में राकेश ने प्रतीक संचेती, पति-पत्नी की जोड़ी में विक्रम ने स्वीटी एवं रोशन ने तनुश्री भंडारी, तथा सास-बहू की जोड़ी में इंदिरा ने युक्ति की तपस्या का अभिनंदन किया।
इसी क्रम में श्रमण संघ स्वाध्याय मंडल के प्रमुख सदस्य अमन सुराणा ने 15 उपवास की साधना पूर्ण की। वहीं टोनू छाजेड़, विक्रम पारख, सिद्धार्थ चौरड़िया, अंकित रतन बोहरा एवं प्रणब संचेती ने आठ-आठ उपवास की कठिन साधना संपन्न की।
-तपस्वियों की साधना की धर्मसभा में उपस्थित
श्रावक-श्राविकाओं ने अनुमोदना करते हुए उनके आत्मबल एवं संयम की सराहना की।
-84 लाख जीव योनियों से क्षमायाचना
संवत्सरी महापर्व के अवसर पर सूर्यास्त के पश्चात जैन विधि-विधान के अनुसार संवत्सरिक प्रतिक्रमण की आराधना की गई। साधक एवं श्रावक-श्राविकाओं ने वर्षभर में जाने-अनजाने में हुए अपराधों, प्रमादों एवं कषायों के लिए आत्मावलोकन करते हुए क्षमायाचना की।
इस अवसर पर 84 लाख जीव योनियों से क्षमा याचना करते हुए जैन शास्त्रों का पाठ एवं प्रतिक्रमण किया गया। वातावरण में आध्यात्मिकता, आत्मचिंतन और क्षमाभाव की अनुभूति स्पष्ट रूप से दिखाई दी।
संवत्सरी महापर्व ने सभी को यह प्रेरणा दी कि जीवन में केवल बाहरी उत्सव ही नहीं, बल्कि आत्मा की शुद्धि, संयम, तप, त्याग, क्षमा और मैत्री का भाव भी जागृत होना चाहिए। यही संवत्सरी का वास्तविक संदेश और आत्मानुभूति का मार्ग है।
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