दुर्ग

कम खाओ, गम खाओ और नाम जपो”—शरीर के लिए कम खाना, परिवार-समाज के लिए गम खाना और धर्म-आत्मा के लिए नाम जपना जरूरी : राष्ट्रसंत मणिभद्र मुनि

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दुर्ग। जय आनंद मधुकर रतन भवन, बांधा तालाब दुर्ग में चल रहे आध्यात्मिक वर्षावास के अंतर्गत आयोजित धर्मसभा को संबोधित करते हुए राष्ट्रसंत, मानव मिलन के संस्थापक मणिभद्र मुनि जी महाराज ने शरीर और आत्मा के संबंध को समझाते हुए कहा कि मनुष्य के जीवन का वास्तविक उद्देश्य केवल शरीर को सुख देना नहीं, बल्कि आत्मा को उसके वास्तविक स्वरूप की ओर ले जाना है।
उन्होंने कहा कि “कम खाओ, गम खाओ और नाम जपो” जीवन का गहरा संदेश है। कम खाना शरीर के लिए हितकारी है, गम खाना अर्थात परिवार और समाज के लिए त्याग एवं सहनशीलता रखना आवश्यक है, जबकि नाम जपना धर्म और आत्मा की उन्नति का मार्ग है।
मुनिश्री ने कहा कि शरीर और आत्मा दो अलग-अलग तत्व हैं। आत्मा का निवास स्थान शरीर माना जाता है। जब तक आत्मा शरीर में रहती है, तब तक उसे किसी न किसी शरीर का आश्रय लेना पड़ता है। संसार की विभिन्न योनियों में जन्म लेते हुए आत्मा जिस शरीर को प्राप्त करती है, उसे ही अपना मानकर उसके प्रति मोह करने लगती है। शरीर से अलग होने की इच्छा न होना ही आत्मा की अज्ञान अवस्था का परिचायक है।
उन्होंने कहा कि शरीर की साधना वास्तव में आत्मा को शरीर के मोह और बंधन से मुक्त करने की साधना है। साधना के माध्यम से आत्मा धीरे-धीरे यह समझने लगती है कि वह शरीर नहीं, बल्कि उससे अलग एक चेतन तत्व है। जब शरीर अपने अंतिम स्वरूप में पहुंच जाता है और आत्मा उससे मुक्त हो जाती है, तब शरीर स्वयं कोई क्रिया करने में सक्षम नहीं रहता।
भोजन के विषय में आध्यात्मिक दृष्टिकोण समझाते हुए मुनिश्री ने कहा कि सामान्य रूप से हमें लगता है कि भोजन शरीर करता है, लेकिन वास्तव में शरीर तो केवल माध्यम है। आत्मा अपने भावों के माध्यम से भोजन का ग्रहण करती है। शरीर में चेतना रहने तक ही भोजन, शक्ति और अन्य शारीरिक क्रियाओं का महत्व है। आत्मा के शरीर से अलग होते ही वही शरीर भोजन ग्रहण करने में असमर्थ हो जाता है।
उन्होंने आगे कहा कि संसार में भोजन करने वाले दो प्रकार के लोग दिखाई देते हैं—संसारी और संत। दोनों भोजन करते हैं, लेकिन दोनों के भोजन करने के उद्देश्य और भावों में बहुत बड़ा अंतर है। संसारी व्यक्ति प्रायः शरीर की शक्ति, स्वाद और भोग की दृष्टि से भोजन करता है, जबकि संत भोजन को शरीर को साधना और धर्म की साधना के योग्य बनाए रखने के लिए ग्रहण करता है। संत के लिए भोजन साधन है, साध्य नहीं।
राष्ट्रसंत मणिभद्र मुनि ने कहा कि आहार केवल पेट भरने का माध्यम नहीं है, बल्कि उसके पीछे हमारे भाव और विचार भी जुड़े हुए हैं। इसलिए भोजन में संयम, जीवन में सहनशीलता और आत्मा के प्रति जागरूकता रखना आवश्यक है। जब मनुष्य शरीर को साधन और आत्मा को अपना वास्तविक स्वरूप समझने लगता है, तभी उसके जीवन में धर्म की वास्तविक शुरुआत होती है।
उन्होंने धर्मसभा में उपस्थित श्रावक-श्राविकाओं से आह्वान किया कि जीवन में आहार में संयम, व्यवहार में सहनशीलता और आत्मा की उन्नति के लिए प्रभु के नाम का स्मरण करते हुए अपने जीवन को सार्थक बनाने का प्रयास करें।‌‌

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