-अगर "मैं कौन हूं?" की गुत्थी को सुलझा लिए तो सब कुछ सहज हो जाएगा
-स्वयं को विश्व नाटक का एक पात्र समझें तो कोई भी परिस्थिति विचलित नही करेंगी
बघेरा, दुर्ग। प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय में चल रहे वाह जिंदगी वाह शिविर के पांचवें दिन राजयोग मेडिटेशन विषय पर बोलते हुए प्रोफेसर ब्रह्माकुमार ई. वी. गिरीश ने कहा कि हमारा कहीं ना कहीं योग रहता ही है। चाहे व्यक्ति का व्यक्ति के साथ या व्यक्ति का किसी वस्तु के साथ या किसी परिस्थिति के साथ हो। आज दुनिया में अनेक प्रकार के योग प्रचलित है। आज आसन और प्राणायाम को ही योग मान लिया गया है जबकि पतंजलि अष्टांग योग में आठ सूत्र बताया गया है उसमें से केवल दो ही सूत्र प्रचलित है आसन और प्राणायाम जो केवल शारीरिक अभ्यास है। श्रीमद् भगवत गीता में भी योग का वर्णन मिलता है जैसे:- ज्ञानयोग, भक्तियोग, बुद्धियोग, कर्मयोग, सांख्ययोग आदि लेकिन सभी योगों में सर्वश्रेष्ठ योग राजयोग मेडिटेशन है। मेडिटेशन शब्द लैटिन के मेडिटेटियो से लिया गया है, जिसका अर्थ है " विचार करना।" मेडिटेशन एक अभ्यास है जिसमें व्यक्ति मानसिक रूप से स्पष्ट और भावनात्मक रूप से शांत अवस्था को प्राप्त करता है। राजयोग मेडिटेशन वह विधि है जिसके द्वारा हम अपने मन बुद्धि के तार उस सर्वशक्तिमान परमात्मा से जोड़ते हैं और सहज रूप से प्रेम, शांति, आनंद और शक्ति की प्राप्ति करते हैं। परमात्मा इन सभी गुणों का सागर है भंडार है मुख्य स्रोत है।

हम सभी की यही शिकायत होता है की योग में मन एकाग्र नहीं होता, इधर-उधर भटकता है। तो इसका कारण है हमारी स्वयं के प्रति गलत मान्यताएं। हम स्वयं को देह समझकर, बॉडी कॉन्शियस होकर परमात्मा से संबंध जोड़ने का प्रयास करते हैं जिसके कारण से हमारा परमात्मा से संबंध ना जुड़कर किसी व्यक्ति, वस्तु या सांसारिक बातों के तरफ बार-बार मन आकर्षित होता है। यह संसार एक रंगमंच है। हम इस विश्व नाटक के एक पात्र है। जिसे जो रोल मिला है वही वह अभिनय कर रहे हैं अगर यह बात हम गहराई से समझ ले तो कोई भी परिस्थिति हमें दुःखी नहीं करेगा। हमारे मन को विचलित नहीं करेगा। हम हर परिस्थिति में शांत और खुश रहेंगे। राजयोग विषय पर बोलते हुए आगे आपने कहा कि हमारा मन प्रायः दो ही तरफ ज्यादतर जाता है। पहला जिसके साथ हमारा टकराव हो, संबंधों में कड़वाहट हो और दूसरा जहां हमारा लगाव हो या जिससे हमें कुछ न कुछ प्राप्ति हो। अगर हम अपना सर्व संबंध परमात्मा के साथ जोड़ लेते हैं तो हमें सर्व प्राप्ति एक से होने लगता है और मन सहज ही परमात्मा से जुट जाता है। अगर "मैं कौन हूं? की गुत्थी को सुलझा लिए तो सब कुछ सहज हो जाएगा।* हम स्वयं को देह से न्यारा, एक ज्योति पुंज, एक पॉइंट ऑफ लाइट, चैतन्य शक्ति आत्मा समझते हैं और फिर परमात्मा से कनेक्ट होने का अभ्यास करते हैं तो सहज ही हम परमात्मा से योग युक्त हो सकते हैं।

परमात्मा आकर के हमें राजयोग सिखलाते है।
परमात्मा को योगेश्वर भी कहते हैं। परमात्मा का पहली श्रेष्ठ शिक्षा है इस देह के अभिमान को मन और बुद्धि से छोड़कर स्वयं को ज्योर्तिबिन्दु आत्मा समझो।* योग के लिए जरूरी है न्यारापन का होना, साक्षी दृष्टा बनेंगे तभी योग आसान होगा। जब हम साक्षी होकर मन में चलने वाले विचारों का निरीक्षण करने लगते हैं तब धीरे-धीरे मन के विचारों की गति कम होने लगता है और मन एकाग्र हो जाता है। मनुष्य सबसे ज्यादा अपने आप से बातें करता है नहीं नहीं कल्पनाएं करते रहता है उनकी कल्पनाएं ज्यादातर नकारात्मक ही होती है जिसके कारण से जीवन में भय, चिंता, तनाव और बीमारियां हैं। अगर कल्पनाएं ही करना है तो अच्छी-अच्छी कल्पनाएं करें जिससे आपका जीवन सुख, शांति, आनंद से भर जाएगा।
वाह जिंदगी वाह कार्यक्रम के अंतर्गत जिन बातों को जाना समझा उन्हें गहराई से अभ्यास और अनुभव करने के लिए 15 दिवसीय शांति अनुभूति शिविर का आयोजन किया जायेगा जो की 26 दिसंबर से 10 जनवरी तक चलेगा जिसका लाभ ब्रह्माकुमारीज के आनंद सरोवर बघेरा एवं राजऋषि भवन केलाबाड़ी सेवाकेंद्रों पर जाकर निम्न चार सत्रों में सुबह 8 बजे से 9 बजे तक एवं 10 बजे से 11:00 तक एवं संध्या 5 बजे से 6 बजे तक एवं 7 से 8 बजे तक कोई भी एक सत्र में सम्मिलित हो कर लिया जा सकता है।
संपादक- पवन देवांगन
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