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“संवैधानिक करुणा और न्यायिक सक्रियता की मिसाल : विधिक सेवा माह की परिकल्पना”

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-जिला न्यायालय परिसर, दुर्ग में राष्ट्रीय विधिक सेवा दिवस के उपलक्ष्य में जिला विधिक सेवा प्राधिकरण में कार्यशाला का आयोजन एवं अभिनव पहल –     दुर्ग। माननीय उच्च न्यायालय छत्तीसगढ़ के मुख्य न्यायाधीश, न्यायमूर्ति रमेश सिन्हा जी की संवेदनशील एवं दूरदर्शी न्यायिक दृष्टि के अनुरूप, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, दुर्ग द्वारा इस वर्ष विधिक सेवा दिवस को केवल एक दिवस तक सीमित न रखते हुए इसे “विधिक सेवा माह” के रूप में समर्पित किया गया है। यह अभियान बाल अधिकार संरक्षण, पीड़ितोन्मुख न्याय, विधिक जागरूकता, तथा पुनर्वास एवं सुधार आधारित न्यायिक दृष्टिकोण को सशक्त करने हेतु केंद्रित है।

बाल अपराध एवं सुरक्षा विषयक कार्यशाला ..         9 नवम्बर 2025 को द्वीप प्रज्जवलन के साथ जिला न्यायालय दुर्ग के नवीन सभागार में “बाल अपराध एवं सुरक्षा” पर एक विशेष कार्यशाला आयोजित हुई। कार्यक्रम की अध्यक्षता  प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश एवं अध्यक्ष, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, दुर्ग द्वारा की गई। कार्यक्रम के अध्यक्षीय उद्बोधन में  प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश ने व्यक्त किया कि, “बच्चे केवल आज के नागरिक नहीं, बल्कि कल के राष्ट्रनिर्माता हैं। उन्हें सही दिशा, संवेदनशील वातावरण और विधिक सुरक्षा प्रदान करना केवल प्रशासनिक दायित्व नहीं, बल्कि सामाजिक कर्तव्य है। कार्यक्रम में उपस्थित जिला कलेक्टर अभिजीत सिंह ने अपने उद्बोधन में बाल संरक्षण और समाजनिर्माण के सूक्ष्म एवं मानवीय आयामों पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने आश्वस्त किया कि आगामी कार्यक्रम जिला न्यायालय और जिला प्रशासन के संयुक्त तत्वावधान में संचालित किए जाएंगे, तथा जिला प्रशासन द्वारा पूर्ण सहयोग प्रदान किया जाएगा। पुलिस महानिरीक्षक, रामगोपाल गर्ग का विस्तृत उद्बोधन में पॉक्सो और बाल सुरक्षा कानूनों के तकनीकी एवं न्यायिक अनुप्रयोग पर विवेचना अधिकारियों को मार्गदर्शन देते हुए कहा कि ऐसे मामलों में जाँच और अभियोजन अत्यंत संवेदनशील, वैज्ञानिक और प्रमाण-आधारित होना चाहिए। उन्होंने यह भी आश्वस्त किया— “पूरे पुलिस विभाग की ओर से जिला विधिक सेवा प्राधिकरण को पूर्ण समर्थन एवं सहयोग लगातार प्रदान किया जाएगा।” इस अवसर पर अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक सुश्री पद्मश्री तंवर ने नशामुक्ति अभियान की रणनीतियों एवं पॉक्सो मामलों की संवेदनशीलता और संतुलित विधिक दृष्टिकोण पर प्रकाश डाला। 

जिला एवं अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश अनिष दुबे ने अपने उद्बोधन में न्यायिक प्रक्रिया के व्यावहारिक एवं तकनीकी पक्षों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि बाल-संबंधित मामलों में न्यायालय, पुलिस, शिक्षा विभाग, स्वास्थ्य विभाग और परिवार—सभी की संयुक्त भूमिका आवश्यक है। उन्होंने कहा “कानून तभी प्रभावी होता है, जब उसके अनुप्रयोग में संवेदनशीलता, प्रशिक्षण और समन्वय हो। बाल न्याय प्रणाली केवल सुनवाई और निर्णय का ढांचा नहीं, बल्कि एक समग्र पुनर्वास मॉडल है, जिसमें बच्चे को संपूर्ण व्यक्तित्व के रूप में देखा जाता है।”उन्होंने अपने न्यायिक अनुभव साझा करते हुए बताया कि—कई मामलों में परिवार, स्कूल एवं समाज की प्रारंभिक सावधानी अपराध को जन्म लेने से रोक सकती थी। न्यायिक और पुलिस अधिकारियों को निरंतर प्रशिक्षण और कौशल विकास आवश्यक है। समाज को जागरूकता के माध्यम से पूर्व-रोकथाम की मानसिकता विकसित करनी होगी। जिला एवं अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश अवध किशोर ने बाल अपराध एवं सुरक्षा पर अपने उद्बोधन में कहा कि बाल संरक्षण की अवधारणा का मूल उद्देश्य केवल विधिक दंड निर्धारण नहीं, बल्कि समाज के सबसे संवेदनशील वर्ग बच्चों—को सही वातावरण, मार्गदर्शन और सुरक्षा प्रदान करना है। उन्होंने बाल सुरक्षा ब्रिगेड के गठन की विस्तृत रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए कहा कि यह ब्रिगेड प्रत्येक विद्यालय में चयनित छात्र-छात्राओं के रूप में कार्य करेगी, जो—सहपाठी सहायता समूह बनाएगी,‘गुड टच-बैड टच’ पर जागरूकता फैलाएगी, नशा एवं ऑनलाइन प्रलोभन जैसे जोखिमों की पहचान करेगी, तथा शिकायत / जानकारी साझा करने हेतु सुरक्षित एवं गोपनीय मार्ग तैयार करेगी। 

अध्यक्ष, अधिवक्ता संघ दुर्ग, सुश्री नीता जैन ने अपने संबोधन में कहा कि आज बच्चों का व्यक्तित्व सिर्फ परिवार और विद्यालय से ही नहीं, बल्कि मोबाइल स्क्रीन और सोशल मीडिया से भी निर्मित हो रहा है।  उन्होंने कहा कि बाल अपराध केवल कानून का विषय नहीं, यह माता-पिता की भागीदारी, संवाद और सतर्कता से भी गहराई से जुड़ा है। यदि घर में स्नेह, मार्गदर्शन और ध्यान का वातावरण हो, तो बच्चा किसी भी नकारात्मक प्रभाव से बचते हुए सही दिशा में विकसित होता है। उन्होंने सभी माता-पिता से अपील की कि बच्चों के साथ समय बिताएँ, संवाद स्थापित करें, और उन्हें सुरक्षित एवं संतुलित डिजिटल वातावरण प्रदान करें—यही वास्तविक बाल संरक्षण है।

नवाचार आधारित न्यायिक पहल - भविष्य की दिशा .. 

किशोर न्याय बोर्ड के प्रधान मजिस्ट्रेट भगवान दास पनिका द्वारा किशोर न्याय अधिनियम के तकनिकी बारिकीयों पर प्रकाश डाला गया । कार्यक्रम में द्विजेन्द्रनाथ ठाकुर, सिविल जज वरिष्ठ श्रेणी ने जिला विधिक सेवा प्राधिकरण द्वारा नवाचारी विधिक जागरूकता कार्यक्रमों, विशेषकर Juvenile Initiative Campaign के अंतर्गत ग्रामीण क्षेत्रों, विद्यालयों एवं बाल-संवेदनशील समुदायों में होने वाले आगामी कार्यक्रमों की रूपरेखा प्रस्तुत की। कार्यक्रम में स्वागत उद्वोधन जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के सचिव उमेश भागवतकर के द्वारा एवं धन्यवाद ज्ञापन भूपेन्द्र कुमार बसंत द्वारा किया गया । कार्यक्रम के दौरान जिला अधिवक्ता संघ दुर्ग के सचिव रविशंकर सिंह, अन्य अधिवक्तागण, अभियोजन अधिकारी, पैरा लिगल वालिंटियर, नगर निगम एवं प्रशासन के विभिन्न विभागों के प्रतिनिधि एवं प्रिंट व इलेक्ट्रानिक मिडिया के सम्मानिय सदस्यगण उपस्थित रहें। 

चित्र प्रदर्शनी - न्याय का मानवीय स्वरूप ..       समापन सत्र में केंद्रीय जेल दुर्ग में निरुद्ध बंदियों एवं पैरा–लीगल वॉलेंटियर्स द्वारा निर्मित चित्रों की प्रदर्शनी का अवलोकन किया गया, जिसने यह पुनः रेखांकित किया कि— “न्याय का उद्देश्य केवल दण्ड देना नहीं, बल्कि सुधार, पुनर्स्थापना और मनुष्य में निहित उजाले को पुनः जागृत करना भी है।”

“बाल सुरक्षा ब्रिगेड” -  शीघ्र प्रारंभ ..          विधिक सेवा माह के अंतर्गत शीघ्र ही जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, जिला प्रशासन एवं स्कूल शिक्षा विभाग के संयुक्त समन्वय से “बाल सुरक्षा ब्रिगेड” का शुभारंभ किया जाएगा।यह ब्रिगेड विद्यालयों में बच्चों को—सुरक्षा, आत्मविश्वास, जागरूकता, नशा एवं शोषण से बचाव, और सहपाठी सहायता प्रणाली के लिए प्रशिक्षित करेगी। यह अभियान केवल कार्यक्रम नहीं — एक सामाजिक जागृति, न्याय का मानवोन्मुख विस्तार और भविष्य की सुरक्षा का संकल्प है।

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