दुर्ग। छत्तीसगढ़ प्रदेश में कार्यरत राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) के 16 हजार से अधिक संविदा स्वास्थ्य कर्मचारी अपनी 10 सूत्रीय मांगों को लेकर 18 अगस्त से अनिश्चितकालीन हड़ताल पर डटे हुए हैं। शनिवार को आंदोलन के 13वें दिन कर्मचारियों ने सरकार के दमनकारी रवैये के खिलाफ केश दान (मुंडन) कर विरोध जताया। इस दौरान कर्मचारियों के हाथों में सरकार द्वारा जारी नोटिस की प्रतियां भी थीं।
मोदी गारंटी और वादाखिलाफी का आरोप
प्रदेश अध्यक्ष डॉ. अमित कुमार मिरी ने कहा कि विधानसभा चुनाव 2023 के दौरान भारतीय जनता पार्टी ने “मोदी की गारंटी” के तहत घोषणा पत्र में एनएचएम कर्मचारियों की समस्याओं के समाधान का वादा किया था। लेकिन सत्ता में आने के बाद 170 से अधिक ज्ञापन दिए जाने के बावजूद सरकार ने अब तक कोई ठोस पहल नहीं की। मजबूर होकर प्रदेश के संविदा स्वास्थ्य कर्मचारी आंदोलन की राह पर हैं।
“दो दशक का शोषण – अब आरपार की लड़ाई”
दुर्ग जिला अध्यक्ष डॉ. आलोक शर्मा ने कहा कि एनएचएम कर्मचारियों का शोषण बीते 20 वर्षों से लगातार हो रहा है। इनमें से 15 साल भाजपा सरकार के ही कार्यकाल में बीते हैं। दूसरे राज्यों की तुलना में छत्तीसगढ़ के संविदा स्वास्थ्य कर्मचारियों की स्थिति अत्यंत दयनीय है। उन्होंने कहा, “सनातन धर्म में मुंडन प्रथा केवल मृत्यु शोक में की जाती है, लेकिन हमने अपने सम्मान और अस्तित्व की लड़ाई में इस तरह विरोध दर्ज कराया है। पुरुष साथियों ने मुंडन किया है, आने वाले दिनों में महिला साथी भी ऐसा करेंगी।”
कर्मचारियों ने किया स्वास्थ्य मंत्री के बयान का खंडन
हड़ताली कर्मचारियों ने स्वास्थ्य मंत्री के उस बयान को पूरी तरह भ्रामक बताया जिसमें कहा गया था कि 10 सूत्रीय मांगों में से 5 मांगें मान ली गई हैं। कर्मचारियों का कहना है कि वास्तव में केवल दो मांगों पर ही सर्कुलर जारी हुआ है। बाकी मांगों को बदलने और तोड़-मरोड़कर पेश करने का प्रयास किया जा रहा है।
मुख्य मांगें अब भी अधूरी
एनएचएम के कर्मचारी अपने नियमितीकरण, स्थायीकरण, पब्लिक हेल्थ कैडर की स्थापना, ग्रेड पे में सुधार, अनुकंपा नियुक्ति सहित कई अहम मांगों को लेकर आंदोलनरत हैं। कर्मचारियों का कहना है कि प्रदेश सरकार बार-बार इन मांगों को केंद्र सरकार के मत्थे मढ़ रही है, जबकि तकनीकी रूप से स्वास्थ्य विभाग और कर्मचारियों से जुड़े फैसले राज्य सरकार के अधीन आते हैं।
आंदोलन उग्र होने के संकेत
कर्मचारियों ने स्पष्ट कहा है कि दो दशकों के शोषण के बाद अब आंदोलन आर-पार की लड़ाई बन चुका है। अगर सरकार ने शीघ्र ठोस निर्णय नहीं लिया तो आंदोलन और उग्र किया जाएगा।
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