-“लेने से नहीं, लौटाने से बनता है महान जीवन”
-“यज्ञ बनो: अपने लिए नहीं, सबके लिए जीने का वैदिक मार्ग”

दुर्ग। लोकमंगल महायज्ञ के अवसर पर दिया गया प्रवचन यज्ञ के वास्तविक स्वरूप को गहराई से उजागर करता है। यज्ञ केवल अग्नि में आहुति देने की क्रिया नहीं बल्कि एक उच्च जीवन जीने की कला है। इसका मूल भाव है दूसरों के लिए जीना परोपकार करना और जीवन में अपने ऋण को चुकाना। जब तक यह भावना नहीं जागती तब तक कोई भी यज्ञ पूर्ण नहीं होता।
मनुष्य प्रकृति से निरंतर लेता है- वायु जल अन्न ऊर्जा,पर क्या उतना ही लौटाता है यही प्रश्न आज के दुःख का कारण भी है। सरल शब्दों में हम लेना जानते हैं देना अभी सीखना बाकी है। वेद का संदेश है—सौ हाथों से ग्रहण करो और हजार हाथों से लौटाओ अर्थात जितना मिला है उससे कई गुना समाज को लौटाने का संकल्प ही यज्ञ है।
प्रवचन में सहज और चुटीले ढंग से कहा गया आज इंसान इतना व्यस्त है कि कमाने का समय है खर्च करने का समय है लेकिन देने का समय नहीं है यही असंतुलन जीवन को अशांत बनाता है।
यज्ञ के गूढ़ अर्थ को समझाते हुए सहस्त्र शब्द की व्याख्या की गई। सहस्त्र का अर्थ केवल संख्या नहीं बल्कि अनेकता और व्यापकता है। जैसे सहस्त्रबाहु का अर्थ हजार भुजाएं नहीं बल्कि हजार भुजाओं के समान शक्ति होना है। उसी प्रकार मनुष्य को भी अपनी क्षमता का विस्तार करना चाहिए केवल अपने लिए नहीं बल्कि समाज के लिए। यज्ञ की सहस्त्रधारा को स्नेह की धारा बताया गया। जैसे घी अग्नि में समर्पित होता है वैसे ही जीवन में स्नेह सरलता और मधुरता का प्रवाह बना रहना चाहिए। कठोरता तो पत्थर में भी होती है महानता तो तरल बनने में है। जीवन में स्नेह की धारा टूटनी नहीं चाहिए।
प्रवचन में गहरे दार्शनिक भाव भी व्यक्त हुए कि एक में अनेक छिपा है व्यष्टि में समष्टि है और पिंड में ब्रह्मांड है। मनुष्य केवल शरीर नहीं बल्कि चेतना का केंद्र है। हम सबके भीतर वही व्यापक सत्ता विद्यमान है इसलिए सीमित होकर भी हम असीम संभावनाओं से भरे हैं। जीवन को बदलने के सरल वैदिक सूत्र भी दिए गए-कम लो ज्यादा दो। स्वार्थ घटाओ सेवा बढ़ाओ। विचार बदलो जीवन बदल जाएगा। अपने लिए नहीं कुछ दूसरों के लिए भी जियो।
प्रवचन का सार यह रहा कि मनुष्य का शरीर नश्वर है लेकिन उसके कर्म और उनके फल अक्षय हैं। जो हम देते हैं वही हमारे पास लौटकर आता है कई गुना होकर। इसलिए यज्ञ केवल एक दिन का अनुष्ठान नहीं बल्कि हर दिन का आचरण होना चाहिए।
आत्ममंथन का प्रश्न क्या हम जीवन को केवल अपने लिए जी रहे हैं या किसी और के जीवन में भी प्रकाश बन रहे हैं।
कार्यक्रम में राकेश दुबे जी द्वारा शंका समाधान सत्र का संयोजन किया गया। संतोष अग्रवाल एवं उनके परिवार ने मुख्य यजमान के रूप में सहभागिता निभाई।
ओमप्रकाश जांगिड़ लोकेश साहू, विनीत शर्मा, संजय शर्मा, देवेश साहू, शैलेन्द्र गिरी, राघव, केशव सहित अनेक श्रद्धालुओं ने आहुति देकर इस आयोजन को सार्थक बनाया। शांति पाठ और प्रसाद वितरण के साथ कार्यक्रम संपन्न हुआ।
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