दुर्ग। ग्राम लिटिया सेमरिया में चल रही संगीतमय शिव महापुराण कथा के छठवें दिन भगवान श्री गणेश के जन्म और विवाह का प्रसंग सुनाया गया। कथा व्यास आचार्य डॉ विक्रांत दुबे महाराज ने यह कथा सुनाई, जिसे सुनकर श्रद्धालु भावविभोर हो उठे।
इस अवसर पर गणेश जी रिद्धि-सिद्धि सहित ढोल-बाजे के साथ धूमधाम से बारात लेकर आए। सभी श्रद्धालुओं ने इस आयोजन में उत्साहपूर्वक भाग लिया।
शकुन्तला ओमप्रकाश शर्मा, पवन शर्मा जिला पंचायत दुर्ग उपाध्यक्ष एवं शर्मा परिवार लिटिया सेमरिया द्वारा आयोजित श्री शिव महापुराण कथा में आचार्य विक्रांत दुबे ने बताया कि हिंदू धर्म में गणेश जी को पांच प्रमुख पूजे जाने वाले देवताओं में से एक माना जाता है। पढ़ाई, ज्ञान, धन लाभ और अच्छी सेहत के लिए भी गणेश जी की पूजा की जाती है। शिव महापुराण के अनुसार, गणेश जी का शरीर लाल और हरे रंग का होता है। ब्रह्मावैवर्त पुराण के मुताबिक, माता पार्वती ने संतान प्राप्ति के लिए पुण्यक व्रत रखा था, जिसके फलस्वरूप उन्हें गणेश जी पुत्र रूप में प्राप्त हुए।
ब्रह्मावैवर्त पुराण में यह भी वर्णित है कि जब सभी देवता गणेश जी को आशीर्वाद दे रहे थे, तब शनि देव सिर झुकाए खड़े थे। माता पार्वती ने उनसे इसका कारण पूछा तो शनि देव ने बताया कि यदि वे गणेश जी को देखेंगे, तो उनका सिर शरीर से अलग हो सकता है।
कथा व्यास ने बताया कि गणेश भगवान ने तुलसी से कहा था कि कलयुग में वह जीवन और मोक्ष देने वाली होंगी, लेकिन उनकी पूजा में तुलसी का प्रयोग नहीं होगा। इसलिए गणेश भगवान को तुलसी चढ़ाना शुभ नहीं माना जाता है।
शिव महापुराण के अनुसार, गणेश जी की दो पत्नियां रिद्धि और सिद्धि थीं, और उनके दो पुत्र शुभ और लाभ हैं।
विक्रांत महाराज ने बताया कि कैसे शिव और पार्वती के तप, श्रद्धा और सृष्टि के कल्याण हेतु दोनों पुत्रों का प्राकट्य हुआ। सबसे पहले उन्होंने कार्तिकेय जी की उत्पत्ति की कथा सुनाई — जिनका जन्म त्रिलोक की रक्षा हेतु हुआ था। भगवान कार्तिकेय को शिव के तेज से उत्पन्न बताया गया, और फिर छह कृतिकाओं द्वारा उनका लालन-पालन कराए जाने की रोचक गाथा को श्रोताओं के समक्ष जीवंत किया।
इसके पश्चात ने भक्तों को भगवान गणेश की लीला का स्मरण कराया — कैसे माता पार्वती ने अपने उबटन से गणेश जी की रचना की, और शिव द्वारा उनका सिर काटे जाने के बाद गजमुख स्वरूप में पुनः जीवन प्रदान किया गया। इस प्रसंग को सुनाते हुए उन्होंने गणेश जी के पहले पूज्य होने का रहस्य भी उजागर किया।
पूरे दिन का माहौल भक्ति, प्रेम और ज्ञान से सराबोर रहा। कथा के अंत में डॉ विक्रांत महाराज ने दोनों देवों की पूजा और उनके गुणों की महिमा बताते हुए यह संदेश दिया कि गणेश जी से हमें विवेक और विनम्रता की शिक्षा मिलती है, तो वहीं कार्तिकेय जी से वीरता और कर्तव्यपरायणता का पाठ मिलता है।
सैकड़ों की संख्या में श्रद्धालुजन उपस्थित रहे, और हर कोई इस दिव्य प्रसंग से भावविभोर हो उठा।
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