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बाबू रेवा राम संस्कृत के बड़े कवि- आचार्य महेश चंद्र

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-डॉ.शर्मा की पुस्तक "छत्तीसगढ़ में संस्कृत" पर रतनपुर में हुई परिचर्चा
भिलाई।
"यूनेस्को ने श्रीमद्भगवद्गीता और भरत मुनि के नाट्यशास्त्र को विश्व धरोहर घोषित किया है। इधर राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 में भारतीय ज्ञान परम्परा की पूरे देश में धूम है। संस्कृत,शिक्षा नीति की आत्मा है। भारत को सांस्कृतिक दिग्विजय भी इसी ने दिलाई। भारत और भारत के बाहर ब्राह्मणेतर विद्वानों ने भी संस्कृत को विश्व भाषा बनाया। इसी क्रम में रतनपुर में सन् 1812 को जन्मे संस्कृत महाकवि बाबू रेवा राम जी आते हैं।" ये विचार हैं भिलाई के साहित्य-संस्कृति सेवी आचार्य डॉ.महेश चन्द्र शर्मा के। डॉ.शर्मा रतनपुर (बिलासपुर) के साहित्य प्रेमियों के बीच अपनी लोकप्रिय पुस्तक "छत्तीसगढ़ में संस्कृत" पर परिचर्चा में सम्बोधन दे रहे थे।
कुछ वर्ष पूर्व यू.जी.सी.ने डॉ. शर्मा को उक्त विषय पर मेज़र रिसर्च प्रोजेक्ट स्वीकृत किया था। शोध कार्य पूर्ण होने पर वह संस्कृति विभाग, छत्तीसगढ़ शासन के सहयोग से पुस्तक रूप में प्रकाशित हुआ। इस पुस्तक के तीसरे अध्याय में बाबू रेवा राम पर विस्तृत सामग्री है। इसी कृति पर महामाया, महासरस्वती और महालक्ष्मी की ऐतिहासिक नगरी रतनपुर में पं.बलराम प्रसाद पांडेय और पं.श्याम सुन्दर तिवारी आदि ने महत्त्वपूर्ण विचार रखे। उपस्थित कुछ नगरवासी महाकवि रेवाराम के शिष्य भी रहे। आचार्य डॉ. शर्मा ने बताया कि बाबूजी ने गीत माधवम्  , सार रामायण दीपिका, ब्राह्मण स्तोत्रम् , गंगालहरी और नर्मदा लहरी के साथ हिन्दी में भी अनेक काव्य पुस्तकें रचीं। वे अनेक भाषाओं और संगीत के भी अच्छे जानकार थे। डॉ.शर्मा  साहित्यकारों के साथ बाबू हाट भी गये जहाँ बैठ कर बाबू रेवा राम जी लोगों से साहित्य - संस्कृति पर संवाद किया करते थे। आचार्य पाण्डेय ने आचार्य डॉ.शर्मा को अपनी पुस्तकें श्री विष्णु महायज्ञ स्मारक ग्रन्थ एवं चतुर्युगी नगरी रतनपुर धाम भी भेंट कीं।   परिचर्चा में अन्ततः यह भी निष्कर्ष निकला कि जब देश-दुनिया में संस्कृत की धूम है, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश और कर्नाटक में कई संस्कृतभाषी गॉंव हैं, स्कूलों और खेल मैदानों में हजारों लोगों में संस्कृत बोली जाती है तो,क्यों न हम जनगणना के समय विवरण में लिखें कि हम संस्कृत भाषा को जानते और मानते हैं, ये हमारी मूल भाषा है।

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