-नवरात्रि का पर्व शक्ति, भक्ति और आत्मशुद्धि का पावन अवसर है
-नवरात्रि में मां परमेश्वरी की आराधना आत्मशक्ति को जागृत करने का सशक्त मार्ग है : घनश्याम देवांगन

भिलाई। नवरात्रि का पर्व भारतीय संस्कृति में सभी सनातनियों के लिए महत्वपूर्ण है, किन्तु देवांगन समाज के लिए इसका विशेष आध्यात्मिक एवं पौराणिक महत्व है। देवांगन समाज की कुलदेवी एवं ईष्ट देवी माता परमेश्वरी है। सभी देवांगन बाहुल्य क्षेत्रों में माता परमेश्वरी का मंदिर स्थापित है, जहां अखंड ज्योति प्रज्ज्वलित कर नवरात्रि में पूरे नौ दिन विशेष धार्मिक अनुष्ठान का आयोजन एवं उत्सव मनाया जाता है। जंवारा बोकर मनोकामना ज्योति जलाए जाते हैं। देवांगन समाज के वरिष्ठ समाजसेवी एवं सलाहकार घनश्याम कुमार देवांगन बताते हैं कि नवरात्रि में मां परमेश्वरी की आराधना केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आत्मशक्ति को जागृत करने का पावन अवसर है। इसे भारतीय संस्कृति में श्रद्धा-भक्ति, आस्था एवं विश्वास का प्रतीक और आत्मशुद्धि का माध्यम माना गया है।
वर्ष में दो प्रमुख नवरात्रि आते हैं- चैत्र नवरात्रि और शारदीय नवरात्रि। इनमें से चैत्र नवरात्रि विशेष रूप से नववर्ष की शुरुआत के साथ मनाई जाती है और यह प्रकृति में नवजीवन, नई ऊर्जा और सकारात्मक परिवर्तन का संदेश देती है। इस पावन अवसर पर देवांगन समाज के समस्त श्रद्धालुगण मां परमेश्वरी की आराधना कर सुख, शांति, समृद्धि और कल्याण की कामना करते हैं।
देवांगन समाज के आदि ग्रंथ परमेश्वरी पुराण ( देवांगन पुराण) के अनुसार मां परमेश्वरी को समस्त सृष्टि की जननी एवं आदिमाता माना गया है। वे ही ब्रह्मांड की सृजन, पालन और संहार की शक्ति हैं। अलग-अलग क्षेत्रों, स्थानों एवं सामाजिक मान्यताओं के अनुसार आदि शक्ति, आदि माता को ही माता परमेश्वरी, दुर्गा, चंडी, भवानी, शक्ति, गौरी, नारायणी, महाकाली, अंबिका, आर्या, शाकंभरी, सती, महिषासुर मर्दिनी आदि नामों से भी संबोधित कर पूजा अर्चना एवं आराधना की जाती है।
श्री देवांगन बताते हैं कि माता परमेश्वरी की पूजा एवं आराधना देवांगन समाज की अधिष्ठात्री कुलदेवी एवं ईष्ट देवी के रूप में की जाती है। इसलिए समाज के लोग नित्य प्रति एवं हरेक शुभ कार्य में माता परमेश्वरी की पूजा अर्चना एवं आराधना करते हैं। हर घर में माता परमेश्वरी की फोटो अथवा मूर्ति विराजित होती है, जिसकी प्रतिदिन दीप प्रज्ज्वलित कर पूजा अर्चना एवं आरती की जाती है। नवरात्रि का पर्व तो भक्तों के लिए विशेष मायने रखता है। मां शक्ति की पूजा साहस, संयम और सकारात्मक जीवन जीने की प्रेरणा देती है। नवरात्रि हमें यह संदेश देती है कि जब मन में श्रद्धा और विश्वास हो, तो जीवन की हर कठिनाई पर विजय प्राप्त की जा सकती है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार जब भी संसार में अधर्म और अन्याय बढ़ता है, तब देवी शक्ति विभिन्न रूपों में प्रकट होकर धर्म की रक्षा करती हैं। इसी कारण नवरात्रि के नौ दिनों में देवी के नौ स्वरूपों—शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री—की पूजा की जाती है।
चैत्र नवरात्रि की शुरुआत अभिजीत मुहूर्त में कलश स्थापना से होती है। भक्त अपने घरों और मंदिरों में विधि-विधान से कलश स्थापित कर मां परमेश्वरी की पूजा-अर्चना करते हैं। इन नौ दिनों में उपवास, जप, पाठ, भजन-कीर्तन, माता सेवा, जस गीत और साधना का विशेष महत्व होता है। पंचमी एवं अष्टमी में विशेष पूजा एवं महाआरती होती है। अष्टमी-नवमी में हवन, कन्या पूजन, भोग भंडारा आदि संपन्न होता है। अंत में जोत जंवारा का श्रृद्धा भक्ति के साथ कलश यात्रा निकालकर विसर्जन किया जाता है। श्रद्धालु देवी दुर्गा के मंत्रों का जाप करते हैं और “दुर्गा सप्तशती” का पाठ कर देवी की कृपा करते हैं। बाजे-गाजे के साथ माता सेवा एवं जस गीत की धूम मचती है। माना जाता है कि सच्ची श्रद्धा और भक्ति से की गई पूजा से जीवन के कष्ट दूर होते हैं और सुख-समृद्धि का मार्ग प्रशस्त होता है।
चैत्र नवरात्रि केवल धार्मिक अनुष्ठान का पर्व नहीं है, बल्कि यह आत्मसंयम और आत्मशुद्धि का भी अवसर है। इन दिनों में लोग अपने आचरण, विचार और जीवनशैली को शुद्ध बनाने का प्रयास करते हैं। उपवास के माध्यम से शरीर को शुद्ध किया जाता है और पूजा-पाठ के माध्यम से मन को सकारात्मक ऊर्जा से भरने का प्रयास किया जाता है। इस प्रकार नवरात्रि व्यक्ति को आत्मिक रूप से मजबूत बनाती है।
सामाजिक दृष्टि से भी नवरात्रि का पर्व अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस अवसर पर मंदिरों और घरों में सामूहिक पूजा, भजन-कीर्तन, माता सेवा, जसगीत, कन्या पूजन और धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन होता है, जिससे समाज में आपसी भाईचारा, सहयोग और सांस्कृतिक एकता की भावना मजबूत होती है। नवरात्रि हमें यह भी सिखाती है कि समाज में स्त्री शक्ति का सम्मान और आदर करना अत्यंत आवश्यक है।
चैत्र नवरात्रि हमें यह संदेश देती है कि जीवन में सकारात्मक सोच, संयम और भक्ति के माध्यम से ही सच्ची शक्ति प्राप्त की जा सकती है। मां परमेश्वरी की आराधना से हमें साहस, धैर्य और सद्बुद्धि मिलती है, जिससे हम जीवन की कठिनाइयों का सामना कर सकें। इसलिए यह पर्व केवल आस्था का नहीं, बल्कि आत्मिक उन्नति और समाज में सद्भाव स्थापित करने का भी प्रतीक है।
संपादक- पवन देवांगन
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