दुर्ग (छत्तीसगढ़)। दुर्ग में विराजित दिगम्बर जैन पट्टाचार्य 108 विशुद्धसागर जी गुरुदेव ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए सत्य के महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि सत्य साधना है। सत्ता की प्राप्ति पुण्योदय से होती है, पर सज्जन पुरुष सत्ता मिलने पर भी सत्य का परित्याग नहीं करता। जो सत्य के मार्ग पर चलता है, उसे स्वतः ही सत्ता प्राप्त हो जाती है।
गुरुदेव ने कहा कि सत्य व्रत है, सत्य धर्म है, सत्य ब्रह्म है। सत्य ही अहिंसा, करुणा, दया और तप का स्वरूप है। सत्य ही सुख की साधना और धर्म का सार है। उन्होंने बताया कि स्वजन भले ही साथ छोड़ दें, पर सत्य कभी साथ नहीं छोड़ता। सत्य का जीवन कठिन अवश्य है, पर असंभव नहीं।
उन्होंने भावों की शुद्धता को सर्वाधिक महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि भावों को संभालो तो भव स्वयं संभल जाएगा। अपने भावों को अशुद्ध न होने दें, क्योंकि भावों की विशुद्धि से ही जीवन का उत्थान होता है। एक क्षण का विपरीत परिणाम भव-भव के दुखों का क्षय कर सकता है।
गुरुदेव ने श्रद्धालुओं से भगवान की भक्ति, गुरुओं की सेवा और जिनवाणी के स्वाध्याय का आह्वान करते हुए कहा कि धर्म ही जीवन का सार है। उन्होंने संदेश दिया कि जीवन में कितने भी कष्ट आएं, धैर्य न छोड़ें और सत्य मार्ग से कभी विचलित न हों। अंत में उन्होंने कहा— “सत्य जानो, सत्य मानो और सत्यपूर्ण जीवन जियो।”
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