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मन उदास है तो परेशान मत होइए। चेहरे पर एक छोटी-सी मुस्कान लाइए, फिर चाहे वो झूठी ही क्यों न हो। आपको खुद बखुद ‘फील गुड’ होने लगेगा। यूनिवर्सिटी ऑफ साउथ ऑस्ट्रेलिया का हालिया अध्ययन तो कुछ यही बयां करता है।

शोधकर्ताओं के मुताबिक हंसी की ताकत को कभी हल्के में नहीं लेना चाहिए। इनसान चाहे स्वाभाविक रूप से हंसे या फिर चेहरे पर खुशी का भाव लाने के लिए उसे मशक्कत करनी पड़े, दोनों ही सूरतों में मस्तिष्क में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। अध्ययन के नतीजे ‘जर्नल एक्सपेरिमेंटल साइकोलॉजी’ के हालिया अंक में प्रकाशित किए गए हैं।

भावनाओं का केंद्र सक्रिय होता है-
मुख्य शोधकर्ता डॉ. फर्नांडो मारमोलेजो-रामोस ने बताया कि हंसने-मुस्कराने से गालों में मौजूद कुछ खास मांसपेशियां हरकत में आ जाती हैं। ये मस्तिष्क के ‘एमिगडाला’ भाग को सक्रिय करती हैं, जो ‘भावनाओं का केंद्र’ कहलाता है।

‘एमिगडाला’ उच्च मात्रा में ‘सेरोटोनिन’, ‘एंडॉर्फिन’ और ‘डोपामाइन’ जैसे ‘फील गुड’ हार्मोन का स्त्राव करने लगता है। इससे दर्द और तनाव का एहसास तो घटता ही है, साथ ही जीवन से संतुष्टि का भाव भी पैदा होता है। हंसी से ढलती उम्र के निशान छिपाने में भी मदद मिलती है। आसपास मौजूद लोग व्यक्ति की उम्र को कम करके आंकते हैं।

स्ट्रेस हार्मोन का उत्पादन घट जाता है-
फर्नांडो ने कहा कि नया अध्ययन तनाव प्रबंधन और डिप्रेशन के इलाज में ‘स्माइल थेरेपी’ की उपयोगिता की पुष्टि करता है। इनसान जबरन हंसे तो भी मस्तिष्क को महसूस होता है कि सबकुछ ठीक है। इससे वह स्ट्रेस हार्मोन ‘कॉर्टिसोल’ का उत्पादन धीमा कर देता है। 

अध्ययन के दौरान प्रतिभागियों को दांतों के बीच में पेन कुछ इस तरह से दबाने का निर्देश दिया गया कि होंठ पेन को न छुएं। इससे गालों की मांसपेशियां सक्रिय हो गईं। उनके मस्तिष्क में ‘फील गुड’ हार्मोन का स्त्राव बढ़ गया, जिससे वे हर चीज के सकारात्मक पहलुओं पर ध्यान केंद्रित करते नजर आए।