लंबी कार्यअवधि, भूख, संक्रमित होने का डर…कोरोना से जंग में इन समस्याओं से जूझ रहे चिकित्सक

नई दिल्ली। कोरोना से मरने से ज्यादा डर मुझे इस बात का है कि मरने के बाद मेरी बॉडी को कोई स्वीकार नहीं करेगा, कोई लेकर नहीं जाएगा। यह बात कोरोना से जंग के फ्रंटलाइन हीरो यानी एक डॉक्टर ने कही। फिलहाल डॉक्टर कुमार एक सरकारी हॉस्पिटल में कोरोना के मरीजों का इलाज कर रहे हैं। वह कहते हैं कि इस लड़ाई में हम योद्धा हैं। बीमारी से पहले हमें खुद से डर से लड़ना पड़ता है।

बाकी हॉस्पिटलों की तरह कुमार के हॉस्पिटल को भी कोरोना की वजह से अलग-अलग जोन में बांट दिया गया है। वह कहते हैं कि रेड जोन में जाना किसी युद्ध के मैदान में जाने बराबर है। यह ही वह जगह है जहां कोरोना से सीरियस केस हैं। यहां जाते वक्त डॉक्टर को खुद की पूरी सुरक्षा करनी होती है। डॉक्टर कुमार कहते है कि पीपीई तो सबसे जरूरी है, लेकिन इसे पूरी शिफ्ट के दौरान पहने रहना अपने आप में बड़ी चुनौती है। मल्टीलेयर वाला मास्क लगाने से उन्हें सांस लेने में भी काफी तकलीफ होती है। कसा हुआ मास्क और सिर पर टोपी के बीच गर्मी और पसीने उन्हें काफी परेशान करते हैं। कोरोना वायरस इधर से उधर न फैले इसलिए इन वॉर्ड्स में एयर कंडीनशनर नहीं चलाया जाता। 8 से 12 घंटे की ड्यूटी के दौरान डॉक्टर कुछ खाना-पीना तो दूर वॉशरूम तक नहीं जा पाते।

एक अन्य डॉक्टर ने बताया कि रेजिडेंट्स डॉक्टर की कमी की वजह से शिफ्ट टाइमिंग लंबी होती है, वहीं पीपीई की कमी के चलते हमें उन्हें भी ध्यान से इस्तेमाल करना होता है। उन्होंने कहा कि हम पब्लिक का बुरा बर्ताव झेल ही रहे हैं, साथ ही साथ अपनी परेशानी बताने से भी हमें मना किया गया है। राजीव गांधी हॉस्पिटल की डॉक्टर छवि गुप्ता कहती हैं कि पीपीई में काम करना थोड़ा मुश्किल तो है लेकिन यह बुलेट प्रूफ जैकेट जैसी है। वह कहती हैं कि एक पीपीई करीब 1000 रुपए की आती है तो हम बार-बार इसे उतारकर नई भी नहीं पहन सकते। गुप्ता ने आगे बताया कि कोरोना मरीजों की ड्यूटी में लगे डॉक्टर घर नहीं जा रहे। हॉस्पिटल के आसपास ही उन्हें होटलों में रोका गया है।

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