शारदीय नवरात्र के अंतिम दिन होती है मां सिद्धिदात्री की पूजा । कन्या भोज, हवन पूजा

सिद्धिदात्री मां दुर्गा का नौवा स्वरूप: मां सिद्धिदात्री
दक्षिणापथ,दुर्ग(सुनील शर्मा)।
आज गुरूवार 14 अक्टूबर 2021 को शारदीय नवरात्र के नवमी तिथि को आदिशक्ति मां दुर्गा के नौवे रूप मां सिद्धिदात्री की पूजा किया जाता हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार, अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व ये आठ सिद्धियां हैं। माता अपने उपासक को ये सभी सिद्धियां देने के कारण ही इन्हें सिद्धिदात्री कहा जाता है।
नवरात्रि का अंतिम दिन है विशेष
इस दिन नवरात्र के प्रमुख आकर्षण में से एक कन्यापूजन भी है। ऐसी मान्यता है कि मां दुर्गा के सिद्धिदात्री रूप की उपासना करने से मनोकामनाएं पूरी होती हैं। जो भक्त नौ दिन का व्रत रखते हैं, उनका नवरात्र व्रत नौ कन्याओं को नौ देवियों के रूप में पूजने के बाद ही पूरा होता है। उन्हें अपने सामर्थ्य के अनुसार भोग लगाकर दक्षिणा देने से ही मां दुर्गा प्रसन्न हो जाती हैं। इसके बाद ही प्रसाद ग्रहण करके व्रत पूर्ण करना चाहिए। शक्ति पूजन का अंतिम दिन होने से ये दिन काफी विशेष होता है।इस दिन व्रति उपवास करता है उन्हे मां सिद्धिदात्री की कृपा होती है ।इस तरह व्रत्ति को नौ देवियों की असीम कृपा प्राप्त होता है ।
ऐसे करें नव कन्यापूजन
कन्याओं को माता रानी का स्वरूप माना जाता है। कन्याओं के घर आने पर माता रानी के जयकारे भी लगाने चाहिए। कन्याओं के घर आने से ही घर पवित्र हो जाता है ।माता के जयकारे लगाने से घर मंदिर हो जाता है इसके बाद कन्याओं के पैर पूजन करना चाहिए। सभी कन्याओं को आसन बिछाकर बैठाना चाहिए, फिर रोली और कुमकुम का टीका लगाने के बाद उनके हाथ में मौली बांधनी चाहिए। अब सभी कन्याओं और बालक की आरती उतारनी चाहिए। इसके बाद माता रानी को भोग लगाया हुआ भोजन कन्याओं को दें।
देवी के साथ जरूरी है बटुक पूजा
मां भगवती को खीर, मिठाई, फल, हलवा, चना, मालपुआ प्रिय है इसलिए कन्या पूजन के दिन कन्याओं को खाने के लिए पूरी, चना और हलवा दिया जाता है। कन्याओं को केसर युक्त खीर, हलवा, पूड़ी खिलाना चाहिए। कन्याओं के साथ एक बालक को भी भोजन कराना चाहिए। बालक को बटुक भैरव और लंगूरा के रूप में पूजा जाता है। देवी की सेवा के लिए भगवान शिव ने हर शक्तिपीठ के साथ एक-एक भैरव को रखा हुआ है, इसलिए देवी के साथ इनकी पूजा भी जरूरी है।

ऐसा है मां का स्वरूप
मां दुर्गा इस रूप में श्वेत वस्त्र धारण की है। मां सिद्धिदात्री चार भुजाओं से युक्त हैं। इनका वाहन सिंह है। यह कमल पुष्प पर भी आसीन होती हैं। इनकी दाहिनी तरफ के नीचे वाले हाथ में कमल पुष्प है।
माता सिद्धिदात्री का मंत्र
सिद्धगंधर्वयक्षाद्यैरसुरैररमरैरपि।
सेव्यमाना सदा भूयात सिद्धिदा सिद्धिदायिनी।।
पूजा हवन की अनिवार्यता
नवरात्र की नवमी तिथि को मां दुर्गा की पूजा के बाद हवन करने का विधान है। शास्त्रों में बताया गया है कि हवन में दिए गए हविष्य को अग्नि देव जिस देवता के नाम से हवन किया जाता है उन तक उनका अंश पहुंचा देते हैं। हवन से संतुष्ट होकर देवी-देवता भक्तों की मनोकामना पूर्ण करते हैं। इतना ही नहीं हवन से आस-पास का वातावरण भी शुद्ध और पवित्र हो जाता है। इसलिए प्राचीन काल में ऋषि मुनि नियमित हवन किया करते थे। आज के जमाने में ऐसा कर पाना हर किसी के लिए संभव नहीं है ऐसे में नवरात्र की नवमी तिथि को हवन करने पर बहुत ही शुभ फल मिलता है। इस दिन किया गया हवन भक्तों की कामना को पूर्ण करके आरोग्य प्रदान करता है।
नवमी के दिन मां दुर्गा की प्रसन्नता के लिए हवन के साथ नवग्रह, पंचदेवता की भी पूजा की जानी चाहिए।
हवनकुंड की ज्वाला प्रज्जवलित होने के बाद घी से 3 या 5 बार गणेशजी, पंचदेवता, नवग्रह, क्षेत्रपाल, ग्राम देवता एवं नगर देवता को आहुति दें। इसके बाद ‘ऊं ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डयै विच्चै नमः’ मंत्र से माता के नाम से आहुति दें। हवन के समय स्वाहा शब्द का उच्चारण करने से अग्नि देवता प्रसन्न होते है ।
मां दुर्गा हवन विधि मंत्र
माता दुर्गा के लिए हवन करते समय ‘ऊं ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डयै विच्चै नमः’ इस बीज मंत्र से 108 बार हवन कुंड में अवश्य डालें। अंत में खीर और शहद मिलाकर इसी मंत्र से हवन कुंड में आहुति दें। अंत में शिवजी और ब्रह्माजी के नाम से आहुति दें। हवन के बाद आरती करें और हवन का भभूत सभी लोग लगाएं। हवन पूर्ण होने पर कन्या भोजन करवाना चाहिए।
देवीभागवत पुराण में बताया गया है कि, दुर्गा सप्तशती के सभी श्लोक मंत्र हैं। अगर आप विस्तार से हवन करना चाहते हैं तो कवच, कीलक, अर्गला का पाठ करते हुए दुर्गा सप्तशती के 13 अध्याय के सभी मंत्रों को बोलकर स्वाहा कहते हवन कुंड में आहुति दें। हवन के पश्चात पंडित से भी आशीर्वाद लेना चाहिए । क्यूंकि पंडित के मुंह से निकला हर वाक्य बह्म वाक्य होता है ।

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