एक अनूठी सांस्कृतिक विरासत-“खप्पर”

दक्षिणापथ, कवर्धा । प्राचीन वैदिक,पौराणिक काल से भारतवर्ष में हिन्दू सनातन संस्कृति में शक्ति पूजा की परम्परा रही है। शक्ति पूजा विविध रूपों में एवं विविध परम्पराओं के साथ की जाती है। ऐसी ही एक अनूठी सांस्कृतिक परम्परा छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा एवं कवर्धा में सदियों से प्रचलित है, वह है ‘खप्पर’ निकालने की परम्परा।
खप्पर चैत्र एवं क्वांर माह की नवरात्रि में अष्टमी तिथि को मध्य रात्रि निकाली जाती है। कवर्धा की बात करें तो कवर्धा रियासत के द्वितीय राजा स्वर्गीय उजियार सिंह के समय में सन1802-03 से दंतेश्वरी मन्दिर से आरम्भ हुई। दंतेश्वरी मन्दिर के वयोवृद्ध पुजारी स्वर्गीय देवीसिंह ठाकुर ने बताया कि हमारी 5 पीढ़ी खप्पर धारण कर अष्टमी में निकल रही है।सर्व प्रथम स्व.झाम सिंह,स्व.उम्मेद सिंह,स्व.बखारी सिंह एवं स्व.नेपाल सिंह और 1969-70 से मेरे द्वारा खप्पर निकाला जा रहा है।

स्वर्गीय देवीसिंह ने बताया था कि कवर्धा में 9 शक्ति पीठ एवं 8भैरव हैं जिन पर खप्पर के दौरान एक-एक नारियल चढ़ाते हैं लेकिन माँ दंतेश्वरी में जोड़ा नारियल चढ़ाया जाता है क्योंकि इस मन्दिर में एक अन्तर्मुखी काली जी और दंतेश्वरी माँ विराजमान हैं। खप्पर निकालने जे पीछे निहित उद्देश्य है कवर्धा स्टेट की सभी दिशाओं में सुख समृद्धि हो और किसी भी प्रकार की प्राकृतिक या दैवीय विपदा न आये।
जब खप्पर निकलता है तब खप्परधारी के सामने एक व्यक्ति(अगुवान)हाथ में खड्ग धारण कर मार्ग प्रशस्त करता हुआ चलता है और खप्परधारी के पीछे तीन चार लोग चलते हैं जो प्रत्येक दिशा के देवी देवताओं के नाम जलते हुए खप्पर में होम डालते हैं। प्राचीन काल से यह प्रावधान था कि खप्पर के सामने से आम नागरिक नहीं गुजरेंगे साथ ही अपने अपने घरों से आड़ लेकर दर्शन करेंगे। इसका दर्शन करने हजारों की संख्या में दर्शनार्थी आते हैं। यह इतना विलक्षण होता है कि विदेशी सैलानी प्रयेक वर्ष इसे देखने आते हैं। कालान्तर में माँ चंडी मन्दिर एवं परमेश्वरी मन्दिर से भी खप्पर निकलना शुरू हुआ।
कवर्धा नगर की इस अद्भुत,अनिर्वचनीय,अलौकिक सांस्कृतिक विरासत ने कवर्धा को अखिल विश्व में उल्लेखनीय बना दिया है। हम सभी भाग्यशाली हैं कि हमें खप्पर का प्रत्यक्ष दर्शन करने का अवसर मिला है।आप सभी को अष्टमी,विजया दशमी की अनंत मंगलमय बधाई।
(आदित्य श्रीवास्तव कवर्धा)

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