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Ro No. 12111/89

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दक्षिणापथ।
अपन संस्कृति ल बचाए के उदिम
सेनानी ल शरधा सुमन
'गेंड़ी नृत्य' ल अंतर्राष्ट्रीय स्तर म चिन्हारी देवाय के सपना देखइया सुभाष बेलचंदन

छत्तीसगढ़ म 'गेंड़ी' के नांव सुनते 'हरेली' तिहार के सुरता आ जथे. इहाँ के अइसन कोनो गाँव नइ होही, जिहां हरेली म लइका मन गेंड़ी नइ चघत होहीं. हमन लइका राहन त अपन गाँव म गेंड़ी दौड़ के आयोजन घलो देखन. कोनो-कोनो गाँव मन म अभी घलो गेंड़ी दौड़ के आयोजन हो जावत होही. फेर ये गेंड़ी ल एक कला के रूप म परिष्कृत कर के एला राष्ट्रीय अउ अंतर्राष्ट्रीय स्तर म चिन्हारी देवाय के सपना कोनो बिरले कलाकार या कला पारखी ही कर सकथे.
सुभाष बेलचंदन अइसने कला पारखी रिहिसे, जेन हरेली परब बखत जब वोकर दूसर दिन लइका मन ल गेंड़ी म चढ़ के चिखला म बड़ा होशियारी के साथ खेलत अउ नाहकत देख के ए कला ल अंतर्राष्ट्रीय स्तर म चिन्हारी देवाय के गुनिस अउ एकर खातिर उदिम घलो करीस.
एकर पहिली हमन ए गेंड़ी नृत्य ल कभू-कभार रायपुर के पुलिस मैदान म गणतंत्र दिवस समारोह म देख लेवत रेहेन, जब छत्तीसगढ़ शासन के पुलिस विभाग के कलाकार मन एकर प्रदर्शन करंय. एकाद पइत दिल्ली के राजपथ म घलो एकर प्रदर्शन दूरदर्शन के माध्यम ले देखे ले मिले रिहिसे. फेर एकर मन के प्रदर्शन ह सिरिफ कुछ सरकारी आयोजन तक ही सीमित रहय. सुभाष बेलचंदन ह जइसे एला आम जनता के पहुँच तक लेगिस, जन-जन के आगू म अउ हर किसम के छोटे-बड़े मंच म एला लोकप्रिय बनाइस, वइसन देखे बर कभू नइ मिलत रिहिसे.
दुरुग जिला के गाँव तिरगा म 24 अगस्त सन् 1984 के माता श्रीमती लता बेलचंदन अउ पिता नंदकुमार बेलचंदन जी के घर जन्मे सुभाष के शिक्षा बी. काम., एम. ए. अंग्रेजी साहित्य, समाज शास्त्र, प्रोग्राम इन रिटेल मैनेजमेंट के संगे संग तबला म विद अंतिम तक रिहिसे. अपन कला क्षेत्र के प्रेरणास्रोत वोमन अपन नाना जी दाऊ नर्मदा प्रसाद गौतम जी ल मानंय, जेकर ले तबला अउ हारमोनियम के प्रारंभिक शिक्षा पाइन. बाद म तबला के शास्त्रीय शिक्षा भूषण देवांगन जी ले, अभिनय के संगे संग छत्तीसगढ़ी कला, अस्मिता अउ कलाकार मन खातिर चिंतन गुरु नारायण चंद्राकर जी ले पाइन, जेकर भारत विभूति आल्हा दल म उन गायक के रूप म जुड़े रिहिन. उंकर नाचा के गुरु डोमार सिंह कुंवर जी रिहिन. वोमन अपन मुख्य प्रेरणास्रोत जितेंद्र देशमुख जी ल मानंय.

सन् 2008 ले सुभाष बेलचंदन द्वारा वनांचल गेंड़ी नृत्य संस्था चिलमगोटा के नाम ले शुरू करे गे गेंड़ी नृत्य के प्रदर्शन हमर छत्तीसगढ़ सहित पूरा देश अउ विदेश म 500 ले जादा मंच मन म हो चुके रिहिसे, फेर मोला एला प्रत्यक्ष देखे के सौभाग्य 19-20 मार्च'21 म तब मिलिस, जब रायपुर के होटल क्लार्क इन म छत्तीसगढ़ी साहित्य महोत्सव के दू दिनी जबर जलसा होए रिहिसे. वइसे तो मीडिया के माध्यम ले एकर सोर अबड़ देखे, सुने अउ पढ़े ले मिलत रिहिसे, फेर सुभाष बेलचंदन अउ उंकर जम्मो संगी मनला प्रत्यक्ष देखे अउ सुने के इही पहला बेरा रिहिसे. तब एकर मनके पहनावा ल देख के मैं उंकर जगा एक प्रश्न घलो पूछे रेहेंव.
आम तौर म हमर छत्तीसगढ़ के मैदानी भाग म जेन भी कला के प्रदर्शन होथे, वोकर पहिरावा अउ सिंगार ह धोती, कुरता अउ कौड़ी आदि सिंगार ले सजे होथे. फेर सुभाष भाई मन के पहिरावा मोला हमर वनांचल म बसे बस्तर क्षेत्र के आरो देवत रिहिसे. मोर पूछे म वो बताइस, हमर बालोद जिला के ए डौंडीलोहारा क्षेत्र ह बस्तर क्षेत्र के संस्कृति ले प्रभावित हे, तेकर सेती हमर मन के पहिरावा अउ सिंगार घलो वइसने दिखथे.
बालोद जिला मुख्यालय ले करीब 50 किमी दुरिहा म बसे डौंडीलोहारा विकास खंड के गाँव रेंगाडबरी म सहायक शिक्षक के पद म लइका मनला पढ़ातेच पढ़ावत वोमन करीब 200 ले जादा लइका सियान मनला गेंड़ी नृत्य म पारंगत कर डारे हें. आज तो वो गाँव के ए स्थिति हे, के उहाँ के एको घर अइसे नइहे, जिहां गेंड़ी नइ बनत होही, अउ वोमा चढ़ के लइका मन अपन बाल सुलभ कला के प्रदर्शन नइ करत होहीं. इही सीखे-गढ़े कलाकार म के जितेन्द्र साहू (गायक), अशोक निषाद (दफड़ा), मोरजध्वज ईस्दा (डमऊ), टेकराम नायक (गुदुम), राधेश्याम बघेल (बेंजो), जनताराम जमडारे अउ लक्ष्मण गंधर्व (मोहरी), अंकालूराम यादव (खड़पड़ी), शेषलाल रावटे (गोला) के संगे-संग नृत्य म पिनेश कुमार, विनय कुमार, खिलेन्द्र कुमार, घनश्याम, मेघनाथ, भूपेश कुमार, बाबूलाल, विकेश कुमार अउ गिरवर आदि कलाकार संगी मनला अपन संग म लेग के उन अपन प्रस्तुति देवत रिहिन हें. जेकर चलत लोकेन्द्र यादव समाज सेवा सम्मान 2016, धरती पुत्र सम्मान 2013, माता कौशल्या सम्मान 2015, दाऊ ढालसिंह दिल्लीवार सम्मान 2017, उत्कृष्ट शिक्षक सम्मान 2019 के संगे-संग अउ कतकों सम्मान ले उनला सम्मानित करे गे रिहिसे. फेर उंकर कहना राहय, के जनता के द्वारा जेन सम्मान मिलथे, वो ह सबले बढ़के होथे.
बहुमुखी प्रतिभा के धनी रहे सुभाष शिक्षा के क्षेत्र म आए ले पहिली एक मल्टीनेशनल कम्पनी म काम करत रिहिसे, फेर वोला लगिस, के इहाँ रहिके तो समाज अउ कला खातिर कुछु करेच नइ पावत हे. त फेर वो कंपनी के नौकरी ल छोड़ के सन् 2008 म सहायक शिक्षक के रूप म चयन होइस, अउ उंकर पद स्थापना चिलमगोटा म होगे. इहें ले फेर उंकर शिक्षा के संगे- संग गेंड़ी नृत्य के सफर घलो चल परिस, जे आज एक बड़का रूख के आकार धरे कतकों नवा पीढ़ी के लइका मनला अपन छांव म कला अउ शिक्षा के अंजोर देवत हे.
गेंड़ी नृत्य के संगे-संग वोमन शिक्षा विभाग के "धरोहर" कार्यक्रम म बालोद जिला ले परीक्षण संपादन टीम ल सक्रिय सदस्य के रूप म अपन सहयोग
घलो देवत रिहिन हें. एमा 'देवार गीत' खातिर उंकर द्वारा करे गे काम विशेष रूप ले उल्लेखनीय हे. 2010 म 'शिक्षा म कठपुतली कला' ले प्रशिक्षण ले के बाद लइका मनला कठपुतली बनाना, कबाड़ ले जुगाड़, कागज के खिलौना बनाए के घलो प्रशिक्षण
देवत रिहिन हें.

छत्तीसगढ़ म देवार ल एक घुमंतु जाति माने जाथे, फेर ए मन कला म भारी सिद्ध होथें. इहाँ तो गीत के एक परंपरा ही हे, जेला 'देवार गीत' के नांव ले जाने जाथे. ए गीत म कई अइसन कहानी हे, जेला एकर माध्यम ले गाये जाथे. प्राचीन लोक साहित्य के अध्ययन ले जानकारी मिलथे, के गोंड़ राजा मन के दरबार म एमन गीत गावत रिहिन हें. फेर कोनो कारण ले उंकर दरबार ले निकाला होगे, तब ले एकर मन के जीवन घुमंतु कस होगे. सुभाष बेलचंदन बालोद क्षेत्र के कलाकार गुलाब मंडावी अउ मनबोध देवार के माध्यम ले इहू विधा खातिर ठोसहा बुता करे रिहिन हें.
सुभाष बेलचंदन वइसे तो बहुमुखी प्रतिभा के धनी रिहिसे, कतकों कला म पारंगत रिहिसे फेर उंकर मुख्य पहिचान गेंड़ी नृत्य के माध्यम ले ही ठउका बनत रिहिसे. अपन संस्था 'वनांचल गेंड़ी नृत्य संस्था ग्राम चिलमगोटा' के जम्मो प्रस्तुति खातिर वोमन गीत लेखन के काम ल घलो खुदेच करत रिहिन हें. अतेक अद्भुत प्रतिभा के धनी ले छत्तीसगढ़ महतारी के अस्मिता ल उजियार करे के भारी आशा बंधत रिहिसे फेर भाग के लेखा ल कोनो बदल नइ सकय, तभे तो विश्वव्यापी महामारी कोरोना ह 2 जून'21 के ये कला रत्न ल पत्नी तरुणा, पुत्र अनुराग अउ पुत्री दीया बेलचंदन के संगे-संग उंकर जतका हितु पिरितु अउ प्रशंसक रिहिन हें, तेकर मनले हमेशा खातिर अलग कर दिस.
हम कभू सोचे नइ रेहेन, अतेक कम उमर म सुभाष बेलचंदन खातिर 'सुरता' लिखे बर लाग जाही. आज उंकर सुरता ल अंतिम जोहार करत, गेंड़ी नृत्य खातिर उंकर खुद के लिखे ए चार लाइन के रचना संग सादर जोहार…
बंदन, बंदन, बंदन, पान-लिमऊ, नरियर
तोला भेंटे हे वो दंतासिरी हिंगलाजिन
धंउरा, लाली अउ हे करिया
डांग सुघ्घर से ना गढ़वाली कंकालीन
तोला भेंटे हे वो दंतासिरी हिंगलाजिन….

हो…
बुढ़ादेव, मड़ियादेव, दूल्हादेव, भंईसासुर,
हो… कंकालीन डोंगरवाली
गोंदला चढ़ाबोन दाई, झंडी चढ़ाबोन दाई
मन के मनौती ल मनाबो..
उंकर संस्था के जम्मो सदस्य मन मिल जुल के उंकर अधूरा सपना ल पूरा करही, इही भरोसा के संग अंतिम सेवा जोहार..