नक्सलियों की मांद से कैसे बची कोबरा कमांडो की जान, कब्जे से रिहाई तक की कहानी, पत्रकार की जुबानी

नई दिल्ली. छत्तीसगढ़ के बीजापुर में नक्सली मुठभेड़ के दौरान सुरक्षाबलों के 22 जवानों की मौत के बीच एक कमांडो का जिंदा लौटना किसी चमत्कार से कम नहीं। पर ऐसा संभव हो सका उन्हीं नक्सलियों के कारण जो जवानों की जघन्य हत्या के जिम्मेदार हैं। नक्सलियों की मांद से कोबरा कमांडो राकेश्वर सिंह मनहास को सकुशल लाने वाले पत्रकारों में शामिल के. शंकर और गणेश मिश्रा ने ‘हिन्दुस्तान’ से बात की और कमांडो के कब्जे से लेकर रिहाई तक की कहानी बताई।  

नक्सलियों के कब्जे में कैसे पहुंचे?
गणेश मिश्रा और शंकर कहते हैं यह सच है कि कोबरा कमांडो नक्सलियों के पास थे, लेकिन यह कहना कि उनका अपहरण हुआ था, सच नहीं है। दरअसल कमांडो राकेश्वर हमले के बाद अपने दल से बिछड़ गए और जंगल में खो गए। छर्रे लगने से वह हल्के जख्मी भी थे और डिहाइड्रेशन के कारण घने जंगलों में बेहोश हो गए थे। बेहोशी की हालत में 04 अप्रैल को वह नक्सलियों को मिले। नक्सली उन्हें अपने कैंप में लेकर पहुंचे और उनका इलाज किया, जिससे उनकी जान बच सकी। 

तुरंत क्यों नहीं रिहा किया?
गणेश कहते हैं 04 अप्रैल को नक्सलियों ने उनके मोबाइल पर मैसेज भेजा कि कमांडो उनके पास सुरक्षित है। एक डेलिगेशन लेकर आएं और उन्हें ले जाएं। डेलिगेशन में कुछ पत्रकार और सोशल वर्कर थे। सबको एकत्र करने में समय लगा। पत्रकार के. शंकर कहते हैं हर अपरहण के बाद शर्तें लागू की जाती हैं। पर इस मामले में ऐसा कुछ नहीं था। रिहाई बिना किसी शर्त के हुई।

दशहत के सात घंटे
गणेश और शंकर बताते हैं कि नक्सलियों के गढ़ में जाने के लिए हम सुबह 5:30 बजे अपनी मोटरसाइकिल से निकल गए थे। 09 बजे हम जंगल के बीच थे। उसके बाद शाम 04 बजे तक हर पल किसी अनहोनी की आशंका ने हमें अनजाने भय में घेर रखा था। रिहाई का वक्त 10 बजे तय हुआ था, पर लगातार हो रही देरी ने हम सभी को आशंकित कर दिया था। नक्सलियों ने करीब 20 गांव के लोगों को बुलावा भेजा था। दोपहर के बाद वे जमा हो सके। इसके बाद जवान को छोड़ा गया। उन्हें सांकेतिक तौर पर रस्सी से बांधा गया था, रस्सी को ग्रामीणों के सामने खोला गया।

क्या थी राजेश्वर की प्रतिक्रिया
के. शंकर ने कहा, बेखौफ वे नक्सलियों के गढ़ में 100 घंटे रहे। रिहाई के वक्त भी उनके चेहरे पर कोई भाव नहीं था। बाइक पर बैठकर जब वह हमारे साथ निकले तो हम पत्रकारों का शुक्रिया किया। यह पूछने पर कि दोबारा आप नक्सलियों के खिलाफ अभियान का हिस्सा बनेंगे, उन्होंने हंसकर सवाल टाल दिया। 

एक पल ऐसा लगा कि सब कुछ खत्म हो जाएगा
गणेश मिश्रा ने बताया पहले भी दो बार साल 2012 और 2013 में उन्होंने जवानों की वापसी करवाई थी। पर इस बार रिहाई के वक्त एक समय माहौल ऐसा हो गया कि लगा कि सब कुछ खत्म हो जाएगा। 2500 के करीब ग्रामीण मौजूद थे। कुछ ग्रामीण आक्रोशित हो गए थे। वे कमांडो को छोड़ने के पक्ष में नहीं थे। नारेबाजी शुरू हो गई थी। पर नक्सलियों की महिला कमांडर मनीला ने हम पत्रकारों को निर्देश दिया कि तत्काल राकेश्वर को लेकर निकलें और सुरक्षित उन्हें परिवार तक पहुंचाएं।

जिस इलाके में मुठभेड़ हुई, कमांडो को वहीं रिहा किया
छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले के जंगल में कोबरा कमांडो राकेश्वर सिंह मनहास की रिहाई उसी इलाके से हुई, जहां 03 अप्रैल को नक्सलियों और सुरक्षाबलों के बीच मुठभेड़ हुई थी। नक्सलियों ने मध्यस्थों को बताया था कि सुबह 10 बजे के करीब जवान को सौंप दिया जाएगा। पर शाम 04 बजे जब तक जन सुनवाई पूरी नहीं हुई, तब तक सबकी सांसे थमी रही। मौके पर मौजूद पत्रकार गणेश मिश्रा और के. शंकर ने ‘हिन्दुस्तान’ को बताया कि दोपहर 01 बजे के बाद तय स्थान पर स्थानीय ग्रामीण जमा होने लगे थे। यह स्थान सुकमा और बीजापुर बॉर्डर का वही इलाका है, जहां 03 अप्रैल को नक्सलियों और सुरक्षाबलों में मुठभेड़ हुई थी। करीब 04 बजे नक्सलियों का एक दस्ता, जिसमें करीब 40 नक्सली थे, पहुंचा। उन्हीं के साथ बीच में कमांडो भी थे।

मोबाइल बंद करवा दिया
मौके पर पहुंचते ही नक्सलियों ने सभी ग्रामीणों, पत्रकारों और मध्यस्थों का मोबाइल ऑफ करवा दिया। इसके बाद बातचीत शुरू हुई। नक्सलियों का दल अपने महिला कमांडर मनीला के साथ आया था। मनीला उस जोन की सेक्रेटरी भी है। सभी उसी के निर्देश का पालन कर रहे थे। 

नक्सलियों ने ग्रामीणों से बात की
ग्रामीणों ने नक्सलियों को अपनी समस्याएं बताईं। यह बातचीत करीब 45 मिनट तक चली। इसके बाद कमांडो राकेश्वर सिंह की रस्सी खोली गई। इस बीच कुछ ग्रामीणों ने जवान को रिहा करने पर विरोध भी जताया। ग्रामीणों का कहना था कि सुरक्षाबल उन्हें बेवजह परेशान करते हैं, ऐसे में उन्हें हमारी शर्तों पर रिहा किया जाना चाहिए। हालांकि महिला कमांडर ने ग्रामीणों को शांत करवाया।

पत्रकारों ने वीडियो का अनुरोध किया
जब कमांडो राकेश्वर को रिहा करने की प्रकिया चल रही थी, तो पत्रकारों ने इसका वीडियो बनाने का अनुरोध किया। महिला कमांडर से अनुमति मिलने के बाद वीडियो शूट किया गया। इस बीच रस्सी खोलने वाले नक्सलियों ने तौलिया से अपना चेहरा ढंक लिया था। 

पत्रकारों पर अधिक भरोसा
पत्रकार के. शंकर और गणेश मिश्रा ने बताया कि नक्सली मीडिया का काफी सम्मान करते हैं। उन्हें मीडिया की निष्पक्षता पर काफी भरोसा है। जब कभी भी ऐसी स्थिति पैदा होती है वो मीडिया को मध्यस्था के लिए चुनते हैं। इस बार भी सबसे पहले उन्होंने मीडिया के जरिए ही यह बात बताई कि कमांडो राकेश्वर सिंह उनके पास हैं औ सुरक्षित हैं। रिहाई के वक्त भी मीडिया की मोटरसाइकिल से उन्हें जंगल से बाहर भेजा गया।

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