जवानों के हर मूवमेंट की हिड़मा को थी पहले से सूचना, सवाल आखिरकार कौन थे घर के भेदी?

अनिमेष पाल/जगदलपुर. बीजापुर जिले के तर्रेम में जिस तरह से नक्सलियों की बटालियन नंबर एक ने पूरे हमले को अंजाम दिया। इससे यहीं लगता है कि नक्सली पूरी तरह से तैयार थे। पूरे हमले के मास्टरमाइंड हिड़मा को जवानों के हर एक मूवमेंट की पूरी जानकारी मिल रही थी। नक्सली इतने तैयार थे कि एक दिन पहले ही मुठभेड़ स्थल के जीरागांव, जोनागुड़ा व टेकुलगुड़ेम को खाली करा लिया गया था और ग्रामीणों को सुरक्षित तरीके से हिड़मा ने अपने गृहग्राम पूवर्ती भेज दिया था। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि आखिरकार वे घर के भेदी कौन थे, जिन्होंने हिड़मा तक इसकी सूचना पहुंचाई। जिनके कारण देश के वीर 22 जवान शहीद हो गए। अब जरूरत आ चुकी है कि पुलिस को ऐसे गद्दारों कि पहचान कर उन पर नकेल कसने की, ताकि बस्तर की मिट्टी दोबारा जवानों के खून से लहुलुहान न हो।

रुट चार्ट पहले से था, तभी लगाया एक किमी लंबा एंबुश
हिड़मा ने जिस तरह से तर्रेम में जवानों को अपने बिछाए गए एंबुश की जद में लिया। इससे तो यहीं लगता है कि हिड़मा को पहले से मालूम था कि जवान किसी रुट से होकर गुजरेंगे। 100 किमी से अधिक बड़े इलाके, जहां ज्यादातर इलाका दुर्गम है और वनों से घिरा हुआ है। हिड़मा ने पूर्व नियोजित तरीके से जीरागांव, जोनागुड़ा व टेकुलगुड़ेम में एक किमी के दायरे में एंबुश लगाया हुआ था।

नक्सली पहाड़ी की ओट से लेकर गंाव के अंदर घरों में छिपे हुए थे। जैसे ही जवान तय जगह पर पहुंचे नक्सलियों ने तीन तरफ से गोलीबारी शुरु कर दी। जवान खुले मैदान में थे और नक्सली छिपे हुए थे। यहीं वजह है कि वे जवानों को ज्यादा से ज्यादा नुकसान पहुंचा सके।

ग्रामीणों के बयान तस्दीक करते हैं नियोजित हमले की
हमले के तीन दिन बाद द फ्रंटियर का संवाददाता जब गांव पहुंचा तो गांव पूरी तरह से आबाद था। बच्चे खेल रहे थे, महिलाएं अपने काम में मशगूल थी। गांव के युवा और बूढ़े अपने काम में जुटे थे। ऐसा लग ही नहीं रहा था कि तीन दिन पहले यह जगह युद्धस्थल में तब्दील था। जब हम वहां पहुंचे तो ग्रामीण डरे, सहमे हुए थे। दो दिनों में कई चैनल व अखबारों के संवाददाता यहां पहुंचे थे और नए चेहरों को देखने के वे आदी हो चुके थे।

ग्रामीणों से जब हमने बात करनी चाही तो वे अपनी बोली में कुछ कह रहे थे। दुभाषिए की मदद से हमने जानना चाहा तो उन्होंने बताया कि उन्हें पूवर्ती भेज दिया गया था। हमले के बाद तो यह स्पष्ट था कि किसने ऐसा किया है। इससे ज्यादा वे कुछ बोलना नहीं चाह रहे थे। शायद उन्हें नक्सलियों का डर था। आखिरकार उन्हें उन्हीं के बीच ही रहना था। सच्चाई तो यहीं है दो-चार दिन बाद न यहां शासन होगा न प्रशासन न कोई पत्रकार।

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