BJP नेता पर आरोप, राजकोट में दलित युवती से बंदूक की नोक पर गैंगरेप

BJP नेता पर आरोप, राजकोट में दलित युवती से बंदूक की नोक पर गैंगरेप

Ro No. 12111/89

Ro No. 12111/89

Ro No. 12111/89

दक्षिणापथ, दुर्ग। ऋषभ नगर स्थित नवकार भवन में चातुर्मास प्रवचन श्रृंखला को आगे बढ़ाते हुए महातपस्विनी श्री प्रभावती जी मसा ने फरमाया कि समाज में तीन तरह की शक्तियां काम करती है। ये तीन शक्तियों को तन बल, धन बल, और बुद्धि बल के रूप में वर्गीकृत कर सकते हैं। तन बल मनुष्यों की तुलना में पशुओं में अधिक हो सकता है। धन बल में भी समाज में असमानता है और बुद्धि बल भी सर्वत्र समान रूप से नहीं होता। बुद्धिमत्ता व्यक्तियों में कम ज्यादा हो सकती है लेकिन बुद्धि बल मनुष्य को प्रकृति का अनुपम उपहार है। इसलिए इसका उपयोग भी विवेकपूर्ण ढंग से किया जाए यह हर मनुष्य का धर्म है।
बुद्धि से विवेक व ज्ञान का प्रादुर्भाव होता है। यदि बुद्धि का सदुपयोग हो, विवेकपूर्ण ढंग से हो तो मनुष्य जीवन का उद्देश्य पूर्ण हो सकता है और यदि बुद्धि का सही व विवेकपूर्ण उपयोग नहीं हो सका तो मनुष्य मार्ग भटक जाता है। यह भटकाव फिर मंज़िल तक पहुंचने में बाधक बन जाता है। साध्वी मसा ने आगे कहा कि विवेकशील मनुष्य आत्म संयम, पवित्र चरित्र, सदाचार आदि को आधार बनाकर पुण्य का संचय करता है और यही पुण्यायी उसे मोक्ष के मार्ग पर ले जाती है। कोई भी व्यक्ति सदाचार, सद्व्यवहार और सदविचार को अपने स्वभाव में समाहित कर लेता है तो उसका चरित्र बल बढ़ जाता है जिसके माध्यम से वह अपनी साधना के मार्ग पर चल कर जीवन के अंतिम लक्ष्य को प्राप्त कर लेता है।
चरित्र बल पर चर्चा करते हुए साध्वी मसा ने एक पुराने उद्धरण की व्याख्या करते हुए कहा कि "धन गया तो कुछ नहीं गया, तन (स्वास्थ्य) गया तो कुछ गया और यदि चरित्र गया तो सब कुछ गया" आप ने कहा कि एक चरित्रहीन व्यक्ति को समाज में कोई स्थान नही मिल पाता। इसलिए जरूरी है हर व्यक्ति का चरित्र ऊँचा हो।
परमविदुषि साध्वी मसा ने वर्तमान परिदृश्य में समाज में गिरते चारित्रिक मूल्यों पर बेहद अफसोस जताया। आधुनिकता के नाम पर फैशन परस्ती की कठोर आलोचना करते हुए आप ने फरमाया कि महिलाओं व युवतियों की मानसिकता बिगड़ गयी है , परिणाम स्वरूप महिलाएं अपने घर में भी सुरक्षित नहीं है। श्रृंगार रस की बाहुल्यता है। पत्र-पत्रिकाओं, टीवी व मोबाइल पर जिस तरह आपत्तिजनक विज्ञापन प्रकाशित व प्रसारित किए जा रहे हैं, इससे समाज पतन की ओर बढ़ रहा है। भाषा, शब्द, और साहित्य सभी क्षेत्रों में अस्वस्थकर वातावरण का निर्माण हो रहा है। त्याग, संयम, तप, साधना का चिंतन करने वाले लोगों की संख्या निरंतर घट रही है। कुछ ही लोग हैं जो अपनी जिम्मेदारीयों का वहन कर रहे हैं अन्यथा ज्यादातर लोग समय व आधुनिकता की धारा में निर्बाध बहते चले जा रहे हैं।
आप ने फरमाया कि मनुष्य के शरीर में रीढ़ की हड्डी की जो महत्ता है वही स्थान वयक्ति के जीवन में चरित्र का है। हर स्थिति में चरित्र को संभाले रखने की जरूरत है। साध्वी मसा ने कहा जिस तरह बिना तेल के दीपक का, बिना पानी के तालाब का कोई अर्थ नहीं रह जाता है उसी तरह बिना चरित्र बल के मनुष्य के जीवन की कोई महत्ता नहीं रह जाती।