पारिवारिक विवादों के निपटारे के लिए देश में ज्यादा से ज्यादा कुटुंब न्यायालयों की स्थापना हो - सरोज पाण्डेय

पारिवारिक विवादों के निपटारे के लिए देश में ज्यादा से ज्यादा कुटुंब न्यायालयों की स्थापना हो - सरोज पाण्डेय

Ro No. 12111/89

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नई दिल्ली ।  संसद में छत्तीसगढ़ की राज्यसभा सांसद सुश्री सरोज पाण्डेय ने कुटुंब  न्यायालय (संशोधन ) विधेयक पर चर्चा की।  इस चर्चा में उन्होंने कुटुंब न्यायालयों की महत्ता और उसके समाज पड़ने वाले प्रभाव के बारे में विस्तार  से बात की। ज्ञात रहे कि  कुटुंब न्यायालयों की राज्यों में स्थापना के लिए केंद्र द्वारा अधिसूचना जारी किया जाना  आवश्यक है लेकिन हिमाचल प्रदेश और नागालैंड में केंद्र द्वारा ऐसी अधिसुचना जारी नहीं की गयी थी।  बिना अधिसूचना के इन न्यायालयों को विधिमान नहीं माना जा सकता था इसीलिए इस संशोधन को लाने की आवश्यकता पड़ी है। चूँकि कुटुंब न्यायालय  अधिनियम- 1984 में पूर्ववर्ती  तारीख से अधिसूचना जारी करने का प्रावधान नहीं था, अतः इस संशोधन में यही प्रस्तावित किया गया है कि केंद्र सरकार पूर्ववर्ती तारीख से कुटुंब न्यायालय कि स्थापना हेतु अधिसूचना जारी कर सकती है। इस संशोधन के पारित होने के पश्चात इन दो राज्यों के कुटुंब न्याययलयों को इनके स्थापना के दिवस से विधिमान रूप से मान्यता मिल जाएगी और यह भविष्य में भी सुचारु रूप से कार्य करते रहेंगे। 
सुश्री पाण्डेय ने कहा कि  भारत एक ऐसा देश है जो सदियों अपने सांस्कृतिक और सामाजिक मूल्यों का पालन करने के लिए और उसे अक्षुण्ण रखने के लिए जाना जाता है।  पारिवारिक बंधन हम सभी भारतियों के लिए जीवन का एक अंग है और इसके बिना भारतीय जीवनपद्धति  की कल्पना भी नहीं की जा सकती।  लेकिन यह भी सत्य की जहाँ दो विचारों  का,सोच का टकराव होगा, वहां विवाद की स्थिति भी पैदा होगी।  लेकिन जब यही स्थिति एक परिवार में हो तो यह आवश्यक है कि अंतिम सीमा तक यह प्रयास किया जाये कि एक परिवार के मतभेद आपसी समझौते  में समाप्त  हो जाएं और वह परिवार  टूटने से बच जाए।    
                        पहले हमारे देश में संयुक्त परिवार हुआ करता था और किसी भी विवाद की स्थिति में  उस परिवार के बड़े बुज़ुर्गों  का निर्णय परिवार के सभी सदस्यों  को मान्य होता था।  संयुक्त परिवार में आपसी प्रेम और सौहार्द के साथ रहे का भाव भी रहता था।  लेकिन जैसे जैसे देश विकास की राह  में आगे बढ़ा, उसका प्रभाव व्यक्ति के सामाजिक और पारिवारिक जीवन  पर भी  पड़ा।  शिक्षा और रोज़गार के लिए घर के बच्चों को अपना मूल परिवार छोड़कर अन्य शहरों ,राज्यों और कही कहीं तो अन्य देशो में भी जाना पड़ा।  इससे संयुक्त की जगह एकल परिवारों में रहना  मज़बूरी बन गया। इन एकल परिवारों में क्योंकि कोई सामाजिक और पारिवारिक दबाव नहीं था,इसीलिए आपसी मतभेद और विवाद की स्थितियां ज्यादा बनने  लगी।    साथ ही, दो पीढ़ियों की संस्कृति और सोच में अंतर होने के कारण  संयुक्त परिवारों में भी मतभेद उभरने  लगे जो जब ज्यादा बढ़ जाते हैं तो अदालतों की चौखट तक पहुँचाने लगे।  लेकिन चूंकि  ऐसे विवाद कोई संज्ञेय अपराध नहीं होते और इसका बुरा प्रभाव परिवार के सभी सदस्यों ,विशेषकर  बच्चों पर सबसे ज्यादा पड़ता है,इसीलिए इन विवादों को शांति और समझाइश से सुलझाने केलिए और परिवारों को एकजुट रखने की भावना के साथ इन कुटुम न्यायालयों की स्थापना की गयी। 
वर्तमान में देश के सभी कुटुंब  न्यायालयों में लंबित केस की संख्या लगभग   11 .49   लाख ह।  यह 11.49  लाख केस नहीं, यह 11.49  लाख परिवार हैं जो किसी न किसी कारण से मानसिक संताप और दुःख झेल रहे है।  आज इस बात की भी आवश्यकता है कि इन कुटुंब न्यायालयों में आनेवाले प्रकरणों को सुलझाने के लिए  एक समयसीमा भी तय की जाये जिससे कोई भी परिवार और उसके सदस्य , चाहे वह माता पिता हों,पति पत्नी हों या भाई भाई हों , उस संताप से जल्द से जल्द बाहर  निकल सकें।  साथ ही, यह भी उचित होगा कि देश में ज्यादा से ज्यादा कुटुंब न्यायालयों कि स्थापना की जाये जिससे कि पारिवारिक विवादों का निपटार जल्द से जल्द हो और परिवार में शांति  स्थापित की जा सके।  हिमाचल प्रदेश और नागालैंड के कुटुंब न्यायालयों को विधिमान वैद्यता प्राप्त होने से इन प्रदेश के लोगों को भी इन न्यायालयों का लाभ मिल सकेगा और इनके पारिवारिक विवादों को जल्द निपटारे  की राह खुल सकेगी जो अंततः एक परिवार को टूटने से बचाएगा और उसके सदस्यों को मानसिक शांति प्रदान करेगा।  
  मै इस बिल का समर्थन करती हूँ और हमारे संवेदनशील प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी को धन्यवाद करती हूँ कि  उन्होंने इन  दो राज्यों की जनता की सुविधा के लिए यह संविधान संशोधन विधेयक संसद में प्रस्तुत किया।