क्या आप भी दोहरा रहे यह कहानी, वर्तमान यथार्थ, सोचना लाजिमी है

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Ro No. 12059/86



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दक्षिणापथ समाचार। समय बदलते रहता है। नीचे लिखी यह कहानी हम सब मध्यमL वर्ग की है। इस तबके में कुछ माता-पिता बड़े समझदार होते हैं, वे अपने बच्चों को सगाई, शादी, लगन, तेरहवीं, उठावना के फंक्शन में नहीं भेजते कि उनकी पढ़ाई में बाधा न हो. उनके बच्चे किसी रिश्तेदार के यहाँ आते-जाते नहीं, न ही किसी का घर आना-जाना पसंद करते हैं. वे हर उस बात से बचते हैं जहां उनका समय बर्बाद होता हो. उनके माता-पिता उनके करियर और व्यक्तित्व निर्माण को लेकर बहुत सजग रहते हैं, वे बच्चे सख्त पाबंदी मे जीते हैं. दिन भर पढ़ाई करते हैं, महंगी कोचिंग जाते हैं, अनहेल्दी फूड नहीं खाते, नींद तोड़कर अलसुबह साइकिलिंग या स्विमिंग को जाते हैं. महंगी कारें, गैजेट्स और क्लोदिंग सीख जाते हैं क्योंकि देर सवेर उन्हें अमीरों की लाइफ स्टाइल जीना है. फिर वे बच्चे औसत प्रतिभा के हों कि होशियार, उनका अच्छा करियर बन ही जाता है क्योंकि स्कूल से निकलते ही उन्हें बड़े शहरों के महंगे कॉलेजों में भेज दिया जाता है जहां जैसे-तैसे उनकी पढ़ाई भी हो जाती है और प्लेसमेंट भी. अब वह बच्चे बड़े शहरों में रहते हैं और छोटे शहरों को हिकारत से देखते हैं. मजदूर, रिक्शा वालों, खोमचे वालों की गंध से बचते हैं. छोटे शहरों के गली-कूचे, धूल गंध देखकर नाक-भौं सिकोड़ते हैं. रिश्तेदारों की आवाजाही उन्हें खामखा की दखल लगती है. फिर वे विदेश चले जाते हैं और अपने देश को भी हिकारत से देखते हैं. वे बहुत खुदगर्ज और संकीर्ण जीवन जीने लगते हैं। अब माता-पिता की तीमारदारी और खोज खबर लेना भी उन्हें बोझ लगने लगता है. पुराना मकान, पुराना सामान, पैतृक प्रॉपर्टी को बचाए रखना उन्हें मूर्खता लगने लगती है, वे जल्दी ही उसे बेचकर 'राइट इन्वेस्टमेंट' करना चाहते हैं. माता-पिता से वीडियो चैट में उनकी बातचीत का मसला अक्सर यहीं रहता है। इधर दूसरी तरफ कुछ ऐसे बच्चे होते हैं जो सबके सुख-दुख में जाते हैं जो किराने की दुकान पर भी जाते हैं। बुआ, चाचा, दादा-दादी को अस्पताल भी ले जाते हैं. तीज त्यौहार, श्राद्ध, बरसी के सब कार्यक्रमों में हाथ बँटाते हैं क्योंकि उनके माता-पिता ने उन्हें  सिखाया है कि सब के सुख-दुख में शरीक होना चाहिए और किसी की तीमारदारी, सेवा और रोजमर्रा के कामों से जी नहीं चुराना चाहिए।. इन बच्चों के माता-पिता, उन बच्चों के माता-पिता की तरह समझदार नहीं होते क्योंकि वे इन बच्चों का क़ीमती समय गैरजरूरी कामों में नष्ट करवा देते हैं. फिर ये बच्चे शहर में ही रहे आते हैं और जिंदगी भर निभाते हैं सब रिश्ते, कुटुम्ब के दायित्व, कर्तव्य. यह बच्चे, उन बच्चों की तरह बड़ा करियर नहीं बना पाते इसलिए उन्हें असफल और कम होशियार मान लिया जाता है. समय गुजरता जाता है, फिर कभी कभार, वे 'सफल बच्चे' अपनी बड़ी गाड़ियों या फ्लाइट से  छोटे शहर आते हैं, दिन भर ए.सी. में रहते हैं, पुराने घर और गृहस्थी में सौ दोष देखते हैं। फिर रात को, इन बाइक, स्कूटर से शहर की धूल-धूप में घूमने वाले, 'असफल बच्चों' को ज्ञान देते हैं कि तुमने अपनी जिंदगी बर्बाद कर ली है. असफल बच्चे लज्जित और हीन भाव से सब सुन लेते हैं. फिर वे 'सफल बच्चे' जाते  वक्त इन असफल बच्चों को, पुराने मकान में रह रही उनकी मां-बाप, नानी, दादी का ख्याल रखने की हिदायतें देकर, वापस बड़े शहरों को लौट जाते हैं. फिर उन बड़े शहरों में रहने वाले बच्चों की, इन छोटे शहर में रह रही मां, पिता, नानी के घर कोई सीपेज या रिपेयरिंग का काम होता है तो यही 'असफल बच्चे' बुलाए जाते हैं. सफल बच्चों के उन वृद्ध मां-बाप के हर छोटे बड़े काम के लिए  यह 'असफल बच्चे' दौड़े चले आते हैं. कभी पेंशन, कभी किराना, कभी मकान मरम्मत, कभी पूजा. जब वे 'सफल बच्चे' मेट्रोज़ के किसी एयर कंडीशंड जिम में ट्रेडमिल कर रहे होते हैं तब छोटे शहर के यह 'असफल बच्चे' उनके बूढ़े पिता का चश्मे का फ्रेम बनवाने, किसी दुकान के काउंटर पर खड़े होते हैं और मरने पर अग्नि देकर तेरहवीं तक सारे क्रियाकर्म भी करते हैं. सफल यह भी हो सकते थे, इनकी प्रतिभा और मेहनत में कोई कमी न थी, मगर इन बच्चों और उनके माता-पिता में शायद जीवन दृष्टि अधिक थी कि उन्होंने धन दौलत से ज़्यादा मानवीय संबंधों और सामाजिक मेल मिलाप को तरजीह दी. सफल बच्चों से कोई अड़चन नहीं है मगर, बड़े शहरों में रहने वाले, आपके वे 'सफल बच्चे' अगर 'सोना' हैं तो छोटे शहरों में रहने वाले यह बच्चे किसी 'हीरे' से कम नहीं. आपके हर छोटे बड़े काम के लिए दौड़े आने वाले यह 'सोनू, छोटू, बबलू' उन करियर सजग बच्चों से कहीं अधिक तवज्जो और सम्मान के हकदार हैं।
पर क्या हम आप उन्हें यह सम्मान देते हैं। या फिर उसी गर्वोक्ति में जी रहे हैं, जो असहाय व तन्हा कर गया। 
सोचना लाज़िम है।