ओंधे मुंह गिरा फेडरेशन का हड़ताल, भूपेश सरकार की दृढ़ता दिखी, महंगाई से परेशानी..

ओंधे मुंह गिरा फेडरेशन का हड़ताल, भूपेश सरकार की दृढ़ता दिखी, महंगाई से परेशानी..

Ro No. 12111/89

Ro No. 12111/89

Ro No. 12111/89

रायपुर। कर्मचारी व अधिकारियों का हड़ताल बेनतीजा खत्म हो गया। प्रदेश के सवा चार अधिकारी व कर्मचारियों के हाथ हड़ताल से कुछ नही आया, उल्टे उनके पांच दिनों का वेतन काटा जा रहा है। इस चक्कर मे उन्हें एक हप्ते विलम्ब से तनख्वाह मिलेगा  इस आंदोलन से निपटने में भूपेश सरकार ने उम्दा कूटनीतिक कौशल का परिचय दिया है। आन्दोलनजीवी तबका अब कोई बड़ा आंदोलन खड़े करने के पहले कई बार सोचेगा।
25 जूलाई से छत्तीसगढ़ राज्य के सवा चार लाख कर्मचारी व अधिकारी केंद्र के समान महंगाई भत्ता व एचआरए की मांग को लेकर काम बन्द आन्दोलन में चला गया था। छत्तीसगढ़ में अभी सरकारी वेतन पाने वालों को सिर्फ 22 फीसदी महंगाई भत्ता मिलता है। जबकि केन्द्र अपने कर्मियों को 34 % डीए दे रहा है। इसी तरह मकान किराया भत्ता भी कम है। इससे वेतन में कर्मचारियों व अधिकारियों को बड़ा नुकसान उठाना पड़ रहा है। अपनी इन्ही मांगो के लिए कर्मचारी व अधिकारियों ने आंदोलन का रुख अख्तियार किया था। एक संयुक्त फेडरेशन के बैनर पर पूरे प्रदेश में आंदोलन किया गया। किंतु भूपेश सरकार ने इस आंदोलन को जरा  ही तवज्जो नही दिया। हड़तालियों को वार्ता के लिए बुलाने लायक भी नही समझा।
फेडरेशन के आन्दोलन पांच दिनों में समाप्त हो गया, किंतु शिक्षकों के तमाम प्रमुख संगठन हड़ताल को अनिश्चितकालीन करने का मन बना चुके थे। किंतु फेडरेशन द्वारा हड़ताल खत्म करने के निर्देश से शिक्षक समुदाय दिग्भ्रमित हो गया, आधे शिक्षक स्कूल लौट गये, स्थिति देखकर शिक्षक संगठनों ने भी आंदोलन वापसी कर ली। 
आंदोलन के दौरान भूपेश सरकार के किसी भी मंत्री या अधिकारी ने हड़ताल खत्म करने सम्बन्धी कोई बयान नही दिया और न ही उनकी मांगों पर भविष्य में विचार करने का आश्वासन दिया। एक तरह से सरकारी कर्मचारी व अधिकारियों का आंदोलन ओंधे मुंह गिर गया और सरकार की सेहत पर भी फिलहाल असर नही पड़ा। 
आसपास के राज्य जैसे मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, उत्तरप्रदेश, उड़ीसा, तेलंगाना में डीए केंद्र के समान दिया जा रहा है। महंगाई भत्ता को सरकारी कर्मियों का अधिकार माना जाता है। अधिकांश राज्य सरकारें केंद्र के बराबर महंगाई भत्ता की घोषणा तुरंत करती रही है। पर भूपेश सरकार ने पिछले दो साल से इसे विलम्बित रखा है। जिस हिसाब से महंगाई बढ़ रही है, छोटे वेतन पाने वाले कर्मचारियों की कठिनाई भी बढ़ रही है। ऊपरी कमाई करने वाले महकमो पर भले इसका ज्यादा असर न पड़े, पर शिक्षक, चपरासी जैसे लोगो को परिवार चलाना मुश्किल हो गया है।
*कम नही आंका जा सकता शिक्षक समुदाय को*
हालिया हड़ताल भले ही बेनतीजा खत्म हो गया हो, पर इसमें 76 संगठनों की सहभागिता ने सरकार के कान खड़े कर दिए है। सरकार जानती है कि कर्मचारियों व अधिकारियों के उक्त संगठन भविष्य में चुप नही बैठेंगे, एवं बड़े आंदोलन की रणनीति बनाएंगे। सम्भव है सरकार इससे निपटने झुनझुना पकड़ा दे। पर सरकारी महकमे के लोग उससे संतुष्ट होंगे या नही, कहना मुश्किल है। 
सवा चार लाख कर्मचारी-अधिकारी की संख्या के पीछे 22-25 लाख लोगों का परिवार खड़ा है। छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में चुनावी गणित को प्रभावित करने के लिहाज से यह कम नही है। सरकारी कामकाजी लोग गांव व शहर के मतदाताओं के विचारों पर भी असर डालते हैं। 
खासतौर पर शिक्षक समुदाय तीन दशकों की अवधि में इतना आंदोलन कर चुके हैं कि उन्हें इसका गहरा अनुभव हो चला है। शिक्षक मानते हैं कि संविदा नियुक्ति से लेकर शिक्षा विभाग में संविलियन की उनकी राह आंदोलन से ही फलीभूत हुई है।